भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1937, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1937

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विसप्ततितमोऽध्यायः

व्यासजीकी आज्ञासे अश्वकी रक्षाके लिये अर्जुनकी, राज्य और नगरकी रक्षाके लिये भीमसेन और नकुलकी तथा कुटुम्ब-पालनके लिये सहदेवकी नियुक्ति

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु कृष्णेन धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
व्यासमामन्त्र्य मेधावी ततो वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
यदा कालं भवान् वेत्ति हयमेधस्य तत्त्वतः ।
दीक्षयस्व तदा मां त्वं त्वय्यायत्तो हि मे क्रतुः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर मेधावी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने व्यासजीको सम्बोधित करके कहा—‘भगवन्! जब आपको अश्वमेध यज्ञ आरम्भ करनेका ठीक समय जान पड़े तभी आकर मुझे उसकी दीक्षा दें; क्योंकि मेरा यज्ञ आपके ही अधीन है’ ॥ १-२ ॥

व्यास उवाच

अहं पैलोऽथ कौन्तेय याज्ञवल्क्यस्तथैव च ।
विधानं यद् यथाकालं तत् कर्तारो न संशयः ॥ ३ ॥
**व्यासजीने कहा—**कुन्तीनन्दन! जब यज्ञका समय आयेगा, उस समय मैं, पैल और याज्ञवल्क्य—ये सब आकर तुम्हारे यज्ञका सारा विधि-विधान सम्पन्न करेंगे; इसमें संशय नहीं है ॥ ३ ॥

चैत्र्यां हि पौर्णमास्यां तु तव दीक्षा भविष्यति ।
सम्भाराः सम्भ्रियन्तां च यज्ञार्थं पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
पुरुषप्रवर! आगामी चैत्रकी पूर्णिमाको तुम्हें यज्ञकी दीक्षा दी जायगी, तबतक तुम उसके लिये सामग्री संचित करो ॥ ४ ॥

अश्वविद्याविदश्चैव सूता विप्राश्च तद्विदः ।
मेध्यमश्वं परीक्षन्तां तव यज्ञार्थसिद्धये ॥ ५ ॥
अश्वविद्याके ज्ञाता सूत और ब्राह्मण यज्ञार्थकी सिद्धिके लिये पवित्र अश्वकी परीक्षा करें ॥ ५ ॥

तमुत्सृज यथाशास्त्रं पृथिवीं सागराम्बराम् ।
स पर्यैतु यशो दीप्तं तव पार्थिव दर्शयन् ॥ ६ ॥