महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे लोगोंके घरपर स्वयं उपस्थित होकर भक्तिपूर्वक विशेषरूपसे दान देना चाहिये। वह दान साधारण दानकी अपेक्षा करोड़गुना फल देनेवाला माना गया है ।।
जाग्रतः स्वपतो वापि प्रवासेषु गृहेष्वथ ।
हृदये न प्रणश्यामि यस्य विप्रस्य भावतः ।।
स पूजितो वा दृष्टो वा स्पृष्टो वापि द्विजोत्तमः ।
सम्भाषितो वा राजेन्द्र पुनात्येवं नरं सदा ।।
राजेन्द्र! जागते अथवा सोते समय, परदेशमें अथवा घर रहते समय जिस ब्राह्मणके हृदयसे उसकी भक्ति-भावनाके कारण मैं कभी दूर नहीं होता, ऐसा वह श्रेष्ठ ब्राह्मण पूजन, दर्शन, स्पर्श अथवा सम्भाषण करने मात्रसे मनुष्यको सदा पवित्र कर देता है ।।
एवं सर्वास्ववस्थासु सर्वदानानि पाण्डव ।
मद्भक्तेभ्यः प्रदत्तानि स्वर्गमार्गप्रदानि वै ।।
पाण्डव! इस प्रकार सब अवस्थाओंमें मेरे भक्तोंको दिये हुए सब प्रकारके दान स्वर्गमार्ग प्रदान करनेवाले होते हैं ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)