भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2096, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2096

नास्ति विप्रात् परो बन्धुर्नास्ति विप्रात् परो निधिः ॥ ब्राह्मणके समान कोई देवता नहीं है, ब्राह्मणके समान कोई गुरु नहीं है, ब्राह्मणसे बढ़कर बन्धु नहीं है और ब्राह्मणसे बढ़कर कोई खजाना नहीं है॥ नास्ति विप्रात् परं तीर्थं न पुण्यं ब्राह्मणात् परम् । न पवित्रं परं विप्रान्न द्विजात् पावनं परम् । नास्ति विप्रात् परो धर्मो नास्ति विप्रात् परा गतिः ॥ कोई तीर्थ और पुण्य भी ब्राह्मणसे श्रेष्ठ नहीं है। ब्राह्मणसे बढ़कर पवित्र कोई नहीं है और ब्राह्मणसे बढ़कर पवित्र करनेवाला कोई नहीं है। ब्राह्मणसे श्रेष्ठ कोई धर्म नहीं और ब्राह्मणसे उत्तम कोई गति नहीं है॥ पापकर्मसमाक्षिप्तं पतन्तं नरके नरम् । त्रायते पात्रमप्येकं पात्रभूते तु तद् द्विजे ॥ बालाहिताग्नयो ये च शान्ताः शूद्रान्नवर्जिताः । मामर्चयन्ति मद्भक्तास्तेभ्यो दत्तमिहाक्षयम् ॥ पापकर्मके कारण नरकमें गिरते हुए मनुष्यका एक सुपात्र ब्राह्मण भी उद्धार कर सकता है। सुपात्र ब्राह्मणोंमें भी जो बाल्यकालसे ही अग्निहोत्र करनेवाले, शूद्रका अन्न त्याग देनेवाले तथा शान्त और मेरे भक्त हैं एवं सदा मेरी पूजा किया करते हैं, उनको दिया हुआ दान अक्षय होता है॥ प्रदानैः पूजितो विप्रो वन्दितो वापि संस्कृतः । सम्भावितो वा दृष्टो वा मद्भक्तो दिवमुन्नयेत् ॥ मेरे भक्त ब्राह्मणको दान देकर उसकी पूजा करने, सिर झुकाने, सत्कार करने, बातचीत करने अथवा दर्शन करनेसे वह मनुष्यको दिव्यलोकमें पहुँचा देता है॥ ये पठन्ति नमस्यन्ति ध्यायन्ति पुरुषास्तु माम् । स तान् दृष्ट्वा च स्पृष्ट्वा च नरः पापैः प्रमुच्यते ॥ जो लोग मेरे गुण और लीलाओंका पाठ करते हैं तथा मुझे नमस्कार करते और मेरा ध्यान करते हैं, उनका दर्शन और स्पर्श करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ मद्भक्ता मद्गतप्राणा मद्गीता मत्परायणाः । बीजयोनिविशुद्धा ये श्रोत्रियाः संयतेन्द्रियाः । शूद्रान्नविरता नित्यं ते पुनन्तीह दर्शनात् ॥ जो मेरे भक्त हैं, जिनके प्राण मुझमें ही लगे हुए हैं, जो मेरी महिमाका गान करते हैं और मेरी शरणमें पड़े रहते हैं, जिनकी उत्पत्ति शुद्ध रज और वीर्यसे हुई है, जो वेदके विद्वान्, जितेन्द्रिय तथा सदा शूद्रान्नसे बचे रहनेवाले हैं, वे दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं॥ स्वयं नीत्वा विशेषेण दानं तेषां गृहेष्वथ । निवापयेत्तु यद्भक्त्या तद् दानं कोटिसम्मितम् ॥