भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2095, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2095

उनपर क्रोध न करे, न उनका अनिष्ट ही करे; क्योंकि ब्राह्मण क्रोधरूपी शस्त्रसे ही प्रहार करते हैं, वे शस्त्र हाथमें रखनेवाले नहीं हैं।। मन्युना घ्नन्ति ते शत्रून् वज्रेणेन्द्र इवासुरान् । ब्राह्मणो हि महत् दैवं जातिमात्रेण जायते ।। जैसे इन्द्र असुरोंका वज्रसे नाश करते हैं, वैसे ही वे ब्राह्मण क्रोधसे शत्रुक्का नाश करते हैं; क्योंकि ब्राह्मण जातिमात्रसे ही महान् देवभावको प्राप्त हो जाता है ।। ब्राह्मणाः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये । किं पुनर्ये च कौन्तेय संध्यां नित्यमुपासते ।। कुन्तीनन्दन! सारे प्राणियोंके धर्मरूपी खजानेकी रक्षा करनेके लिये साधारण ब्राह्मण भी समर्थ हैं, फिर जो नित्य संध्योपासन करते हैं, उनके विषयमें तो कहना ही क्या है? ।। यस्यास्येन समश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः । कव्यानि चैव पितरः किं भूतमधिकं ततः ।। जिसके मुखसे स्वर्गवासी देवगण हविष्यका और पितर कव्यका भक्षण करते हैं, उससे बढ़कर कौन प्राणी हो सकता है? ।। उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती । स हि धर्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ।। ब्राह्मण जन्मसे ही धर्मकी सनातन मूर्ति है। वह धर्मके ही लिये उत्पन्न हुआ है और वह ब्रह्मभावको प्राप्त होनेमें समर्थ है ।। स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वयं वस्ते ददाति च । आनृशंस्याद् ब्राह्मणस्य भुञ्जते हीतरे जनाः । तस्मात् ते नावमन्तव्या मद्भक्ता हि द्विजाः सदा ।। ब्राह्मण अपना ही खाता, अपना ही पहनता और अपना ही देता है। दूसरे मनुष्य ब्राह्मणकी दयासे ही भोजन पाते हैं। अतः ब्राह्मणोंका कभी अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सदा ही मुझमें भक्ति रखनेवाले होते हैं ।। आरण्यकोपनिषदि ये तु पश्यन्ति मां द्विजाः । निगूढं निष्कलावस्थं तान् प्रयत्नेन पूजय ।। जो ब्राह्मण बृहदारण्यक-उपनिषदमें वर्णित मेरे गूढ़ और निष्कल स्वरूपका ज्ञान रखते हैं, उनका यत्नपूर्वक पूजन करना ।। स्वगृहे वा प्रवासे वा दिवारात्रमथापि वा । श्रद्धया ब्राह्मणाः पूज्या मद्भक्ता ये च पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन! घरपर या विदेशमें, दिनमें या रातमें मेरे भक्त ब्राह्मणोंकी निरन्तर श्रद्धाके साथ पूजा करते रहना चाहिये ।। नास्ति विप्रसमं दैवं नास्ति विप्रसमो गुरुः ।