महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2094, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाभारत, मनुस्मृति, अंगोंसहित चारों वेद और आयुर्वेद शास्त्र—ये चारों सिद्ध उपदेश देनेवाले हैं, अतः तर्कद्वारा इनका खण्डन नहीं करना चाहिये ।। न ब्राह्मणान् परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् । महान् भवेत् परीवादो ब्राह्मणानां परीक्षणे ।। धर्मको जाननेवाले पुरुषको देवसम्बन्धी कार्यमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि ब्राह्मणोंकी परीक्षा करनेसे यजमानकी बड़ी निन्दा होती है ।। श्वत्वं प्राप्नोति निन्दित्वा परीवादात् खरो भवेत् । कृमिर्भवत्यभिभवात् कीटो भवति मत्सरात् ।। ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला मनुष्य कुत्तेकी योनिमें जन्म लेता है, उसपर दोषारोपण करनेसे गदहा होता है और उसका तिरस्कार करनेसे कृमि होता है तथा उसके साथ द्वेष करनेसे वह कीड़ेकी योनिमें जन्म पाता है ।। दुर्वृत्ता वा सुवृत्ता वा प्राकृता वा सुसंस्कृताः । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नयः ।। ब्राह्मण चाहे दुराचारी हों या सदाचारी, संस्कारहीन हों या संस्कारोंसे सम्पन्न, उनका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे भस्मसे ढकी हुई आगके तुल्य हैं ।। क्षत्रियं चैव सर्पं च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम् । नावमन्येत मेधावी कृशानपि कदाचन ।। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि क्षत्रिय, साँप और विद्वान् ब्राह्मण यदि कमजोर हों तो भी कभी उनका अपमान न करे ।। एतत् त्रयं हि पुरुषं निर्दहेदवमानितम् । तस्मादेतत् प्रयत्नेन नावमन्येत बुद्धिमान् ।। क्योंकि वे तीनों अपमानित होनेपर मनुष्यको भस्म कर डालते हैं। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको प्रयत्नपूर्वक उनके अपमानसे बचना चाहिये ।। यथा सर्वास्ववस्थासु पावको दैवतं महत् । तथा सर्वास्ववस्थासु ब्राह्मणो दैवतं महत् ।। जिस प्रकार सभी अवस्थाओंमें अग्नि महान् देवता हैं, उसी प्रकार सभी अवस्थाओंमें ब्राह्मण महान् देवता हैं ।। व्यङ्गाः काणाश्च कुब्जाश्च वामनाङ्गास्तथैव च । सर्वे दैवे नियोक्तव्या व्यामिश्रा वेदपारगैः ।। अंगहीन, काने, कुबड़े और बौने—इन सब ब्राह्मणोंको देवकार्यमें वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ नियुक्त करना चाहिये ।। मन्युं नोत्पादयेत् तेषां न चारिष्टं समाचरेत् । मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रपाणयः ।।