महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2093, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयेषां दाराः प्रतीक्ष्यन्ते सहस्रस्येव लम्भनम् । भुक्तशेषस्य भक्तस्य तान् निमन्त्रय पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन! जिनकी स्त्रियाँ अपने पतिके भोजनसे बचे हुए अन्नको हजारों गुना लाभ समझकर उसके मिलनेकी प्रतीक्षा किया करती हैं, ऐसे ब्राह्मणोंको तुम भोजनके लिये निमन्त्रित करना ।।
आमन्त्र्य तु निराशानि न कर्तव्यानि भारत । कुलानि सुदरिद्राणि तेषामाशा हता भवेत् ।। भारत! दरिद्रकुलके ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके उन्हें निराश न लौटाना, अन्यथा उनकी आशा मारी जायगी ।।
मद्भक्ता ये नरश्रेष्ठ मद्गता मत्परायणाः । मद्याजिनो मन्नियमास्तान् प्रयत्नेन पूजयेत् ।। नरश्रेष्ठ! जो मेरे भक्त हों, मेरेमें मन लगानेवाले हों, मेरी शरणमें हों, मेरा पूजन करते हों और नियमपूर्वक मुझमें ही लगे रहते हों, उनका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये ।।
तेषां तु पावनायाहं नित्यमेव युधिष्ठिर । उभे संध्येऽधितिष्ठामि ह्यस्कन्नं तद् व्रतं मम ।। युधिष्ठिर! अपने उन भक्तोंको पवित्र करनेके लिये मैं प्रतिदिन दोनों समय संध्यामें व्याप्त रहता हूँ। मेरा यह नियम कभी खण्डित नहीं होता ।।
तस्मादष्टाक्षरं मन्त्रं मद्भक्तैर्वीतकल्मषैः । संध्याकाले तु जप्तव्यं सततं चात्मशुद्धये ।। इसलिये मेरे निष्पाप भक्तजनोंको चाहिये कि वे आत्मशुद्धिके लिये संध्याके समय निरन्तर अष्टाक्षर मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय)-का जप करते रहें ।।
अन्येषामपि विप्राणां किल्बिषं हि विनश्यति । उभे संध्येऽप्युपासीत तस्माद् विप्रो विशुद्धये ।। संध्या और अष्टाक्षर-मन्त्रका जप करनेसे दूसरे ब्राह्मणोंके भी पाप नष्ट हो जाते हैं, अतः चित्तशुद्धिके लिये प्रत्येक ब्राह्मणको दोनों कालकी संध्या करनी चाहिये ।।
दैवे श्राद्धेऽपि विप्रः स नियोक्तव्योऽजुगुप्सया । जुगुप्सितस्तु यः श्राद्धं दहत्यग्निरिवेन्धनम् ।। जो ब्राह्मण इस प्रकार संध्योपासन और जप करता हो, उसे देवकार्य और श्राद्धमें नियुक्त करना चाहिये। उसकी निन्दा कदापि नहीं करनी चाहिये; क्योंकि निन्दा करनेपर ब्राह्मण उस श्राद्धको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे आग ईंधनको जला डालती है ।।
भारतं मानवो धर्मो वेदाः साङ्गाश्चिकित्सितम् । आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि हेतुभिः ।।