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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

येषां दाराः प्रतीक्ष्यन्ते सहस्रस्येव लम्भनम् । भुक्तशेषस्य भक्तस्य तान् निमन्त्रय पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन! जिनकी स्त्रियाँ अपने पतिके भोजनसे बचे हुए अन्नको हजारों गुना लाभ समझकर उसके मिलनेकी प्रतीक्षा किया करती हैं, ऐसे ब्राह्मणोंको तुम भोजनके लिये निमन्त्रित करना ।।

आमन्त्र्य तु निराशानि न कर्तव्यानि भारत । कुलानि सुदरिद्राणि तेषामाशा हता भवेत् ।। भारत! दरिद्रकुलके ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके उन्हें निराश न लौटाना, अन्यथा उनकी आशा मारी जायगी ।।

मद्भक्ता ये नरश्रेष्ठ मद्गता मत्परायणाः । मद्याजिनो मन्नियमास्तान् प्रयत्नेन पूजयेत् ।। नरश्रेष्ठ! जो मेरे भक्त हों, मेरेमें मन लगानेवाले हों, मेरी शरणमें हों, मेरा पूजन करते हों और नियमपूर्वक मुझमें ही लगे रहते हों, उनका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये ।।

तेषां तु पावनायाहं नित्यमेव युधिष्ठिर । उभे संध्येऽधितिष्ठामि ह्यस्कन्नं तद् व्रतं मम ।। युधिष्ठिर! अपने उन भक्तोंको पवित्र करनेके लिये मैं प्रतिदिन दोनों समय संध्यामें व्याप्त रहता हूँ। मेरा यह नियम कभी खण्डित नहीं होता ।।

तस्मादष्टाक्षरं मन्त्रं मद्भक्तैर्वीतकल्मषैः । संध्याकाले तु जप्तव्यं सततं चात्मशुद्धये ।। इसलिये मेरे निष्पाप भक्तजनोंको चाहिये कि वे आत्मशुद्धिके लिये संध्याके समय निरन्तर अष्टाक्षर मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय)-का जप करते रहें ।।

अन्येषामपि विप्राणां किल्बिषं हि विनश्यति । उभे संध्येऽप्युपासीत तस्माद् विप्रो विशुद्धये ।। संध्या और अष्टाक्षर-मन्त्रका जप करनेसे दूसरे ब्राह्मणोंके भी पाप नष्ट हो जाते हैं, अतः चित्तशुद्धिके लिये प्रत्येक ब्राह्मणको दोनों कालकी संध्या करनी चाहिये ।।

दैवे श्राद्धेऽपि विप्रः स नियोक्तव्योऽजुगुप्सया । जुगुप्सितस्तु यः श्राद्धं दहत्यग्निरिवेन्धनम् ।। जो ब्राह्मण इस प्रकार संध्योपासन और जप करता हो, उसे देवकार्य और श्राद्धमें नियुक्त करना चाहिये। उसकी निन्दा कदापि नहीं करनी चाहिये; क्योंकि निन्दा करनेपर ब्राह्मण उस श्राद्धको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे आग ईंधनको जला डालती है ।।

भारतं मानवो धर्मो वेदाः साङ्गाश्चिकित्सितम् । आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि हेतुभिः ।।

महाभारत, मनुस्मृति, अंगोंसहित चारों वेद और आयुर्वेद शास्त्र—ये चारों सिद्ध उपदेश देनेवाले हैं, अतः तर्कद्वारा इनका खण्डन नहीं करना चाहिये ।। न ब्राह्मणान् परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् । महान् भवेत् परीवादो ब्राह्मणानां परीक्षणे ।। धर्मको जाननेवाले पुरुषको देवसम्बन्धी कार्यमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि ब्राह्मणोंकी परीक्षा करनेसे यजमानकी बड़ी निन्दा होती है ।। श्वत्वं प्राप्नोति निन्दित्वा परीवादात् खरो भवेत् । कृमिर्भवत्यभिभवात् कीटो भवति मत्सरात् ।। ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला मनुष्य कुत्तेकी योनिमें जन्म लेता है, उसपर दोषारोपण करनेसे गदहा होता है और उसका तिरस्कार करनेसे कृमि होता है तथा उसके साथ द्वेष करनेसे वह कीड़ेकी योनिमें जन्म पाता है ।। दुर्वृत्ता वा सुवृत्ता वा प्राकृता वा सुसंस्कृताः । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नयः ।। ब्राह्मण चाहे दुराचारी हों या सदाचारी, संस्कारहीन हों या संस्कारोंसे सम्पन्न, उनका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे भस्मसे ढकी हुई आगके तुल्य हैं ।। क्षत्रियं चैव सर्पं च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम् । नावमन्येत मेधावी कृशानपि कदाचन ।। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि क्षत्रिय, साँप और विद्वान् ब्राह्मण यदि कमजोर हों तो भी कभी उनका अपमान न करे ।। एतत् त्रयं हि पुरुषं निर्दहेदवमानितम् । तस्मादेतत् प्रयत्नेन नावमन्येत बुद्धिमान् ।। क्योंकि वे तीनों अपमानित होनेपर मनुष्यको भस्म कर डालते हैं। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको प्रयत्नपूर्वक उनके अपमानसे बचना चाहिये ।। यथा सर्वास्ववस्थासु पावको दैवतं महत् । तथा सर्वास्ववस्थासु ब्राह्मणो दैवतं महत् ।। जिस प्रकार सभी अवस्थाओंमें अग्नि महान् देवता हैं, उसी प्रकार सभी अवस्थाओंमें ब्राह्मण महान् देवता हैं ।। व्यङ्गाः काणाश्च कुब्जाश्च वामनाङ्गास्तथैव च । सर्वे दैवे नियोक्तव्या व्यामिश्रा वेदपारगैः ।। अंगहीन, काने, कुबड़े और बौने—इन सब ब्राह्मणोंको देवकार्यमें वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ नियुक्त करना चाहिये ।। मन्युं नोत्पादयेत् तेषां न चारिष्टं समाचरेत् । मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रपाणयः ।।

उनपर क्रोध न करे, न उनका अनिष्ट ही करे; क्योंकि ब्राह्मण क्रोधरूपी शस्त्रसे ही प्रहार करते हैं, वे शस्त्र हाथमें रखनेवाले नहीं हैं।। मन्युना घ्नन्ति ते शत्रून् वज्रेणेन्द्र इवासुरान् । ब्राह्मणो हि महत् दैवं जातिमात्रेण जायते ।। जैसे इन्द्र असुरोंका वज्रसे नाश करते हैं, वैसे ही वे ब्राह्मण क्रोधसे शत्रुक्का नाश करते हैं; क्योंकि ब्राह्मण जातिमात्रसे ही महान् देवभावको प्राप्त हो जाता है ।। ब्राह्मणाः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये । किं पुनर्ये च कौन्तेय संध्यां नित्यमुपासते ।। कुन्तीनन्दन! सारे प्राणियोंके धर्मरूपी खजानेकी रक्षा करनेके लिये साधारण ब्राह्मण भी समर्थ हैं, फिर जो नित्य संध्योपासन करते हैं, उनके विषयमें तो कहना ही क्या है? ।। यस्यास्येन समश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः । कव्यानि चैव पितरः किं भूतमधिकं ततः ।। जिसके मुखसे स्वर्गवासी देवगण हविष्यका और पितर कव्यका भक्षण करते हैं, उससे बढ़कर कौन प्राणी हो सकता है? ।। उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती । स हि धर्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ।। ब्राह्मण जन्मसे ही धर्मकी सनातन मूर्ति है। वह धर्मके ही लिये उत्पन्न हुआ है और वह ब्रह्मभावको प्राप्त होनेमें समर्थ है ।। स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वयं वस्ते ददाति च । आनृशंस्याद् ब्राह्मणस्य भुञ्जते हीतरे जनाः । तस्मात् ते नावमन्तव्या मद्भक्ता हि द्विजाः सदा ।। ब्राह्मण अपना ही खाता, अपना ही पहनता और अपना ही देता है। दूसरे मनुष्य ब्राह्मणकी दयासे ही भोजन पाते हैं। अतः ब्राह्मणोंका कभी अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सदा ही मुझमें भक्ति रखनेवाले होते हैं ।। आरण्यकोपनिषदि ये तु पश्यन्ति मां द्विजाः । निगूढं निष्कलावस्थं तान् प्रयत्नेन पूजय ।। जो ब्राह्मण बृहदारण्यक-उपनिषदमें वर्णित मेरे गूढ़ और निष्कल स्वरूपका ज्ञान रखते हैं, उनका यत्नपूर्वक पूजन करना ।। स्वगृहे वा प्रवासे वा दिवारात्रमथापि वा । श्रद्धया ब्राह्मणाः पूज्या मद्भक्ता ये च पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन! घरपर या विदेशमें, दिनमें या रातमें मेरे भक्त ब्राह्मणोंकी निरन्तर श्रद्धाके साथ पूजा करते रहना चाहिये ।। नास्ति विप्रसमं दैवं नास्ति विप्रसमो गुरुः ।

नास्ति विप्रात् परो बन्धुर्नास्ति विप्रात् परो निधिः ॥ ब्राह्मणके समान कोई देवता नहीं है, ब्राह्मणके समान कोई गुरु नहीं है, ब्राह्मणसे बढ़कर बन्धु नहीं है और ब्राह्मणसे बढ़कर कोई खजाना नहीं है॥ नास्ति विप्रात् परं तीर्थं न पुण्यं ब्राह्मणात् परम् । न पवित्रं परं विप्रान्न द्विजात् पावनं परम् । नास्ति विप्रात् परो धर्मो नास्ति विप्रात् परा गतिः ॥ कोई तीर्थ और पुण्य भी ब्राह्मणसे श्रेष्ठ नहीं है। ब्राह्मणसे बढ़कर पवित्र कोई नहीं है और ब्राह्मणसे बढ़कर पवित्र करनेवाला कोई नहीं है। ब्राह्मणसे श्रेष्ठ कोई धर्म नहीं और ब्राह्मणसे उत्तम कोई गति नहीं है॥ पापकर्मसमाक्षिप्तं पतन्तं नरके नरम् । त्रायते पात्रमप्येकं पात्रभूते तु तद् द्विजे ॥ बालाहिताग्नयो ये च शान्ताः शूद्रान्नवर्जिताः । मामर्चयन्ति मद्भक्तास्तेभ्यो दत्तमिहाक्षयम् ॥ पापकर्मके कारण नरकमें गिरते हुए मनुष्यका एक सुपात्र ब्राह्मण भी उद्धार कर सकता है। सुपात्र ब्राह्मणोंमें भी जो बाल्यकालसे ही अग्निहोत्र करनेवाले, शूद्रका अन्न त्याग देनेवाले तथा शान्त और मेरे भक्त हैं एवं सदा मेरी पूजा किया करते हैं, उनको दिया हुआ दान अक्षय होता है॥ प्रदानैः पूजितो विप्रो वन्दितो वापि संस्कृतः । सम्भावितो वा दृष्टो वा मद्भक्तो दिवमुन्नयेत् ॥ मेरे भक्त ब्राह्मणको दान देकर उसकी पूजा करने, सिर झुकाने, सत्कार करने, बातचीत करने अथवा दर्शन करनेसे वह मनुष्यको दिव्यलोकमें पहुँचा देता है॥ ये पठन्ति नमस्यन्ति ध्यायन्ति पुरुषास्तु माम् । स तान् दृष्ट्वा च स्पृष्ट्वा च नरः पापैः प्रमुच्यते ॥ जो लोग मेरे गुण और लीलाओंका पाठ करते हैं तथा मुझे नमस्कार करते और मेरा ध्यान करते हैं, उनका दर्शन और स्पर्श करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ मद्भक्ता मद्गतप्राणा मद्गीता मत्परायणाः । बीजयोनिविशुद्धा ये श्रोत्रियाः संयतेन्द्रियाः । शूद्रान्नविरता नित्यं ते पुनन्तीह दर्शनात् ॥ जो मेरे भक्त हैं, जिनके प्राण मुझमें ही लगे हुए हैं, जो मेरी महिमाका गान करते हैं और मेरी शरणमें पड़े रहते हैं, जिनकी उत्पत्ति शुद्ध रज और वीर्यसे हुई है, जो वेदके विद्वान्, जितेन्द्रिय तथा सदा शूद्रान्नसे बचे रहनेवाले हैं, वे दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं॥ स्वयं नीत्वा विशेषेण दानं तेषां गृहेष्वथ । निवापयेत्तु यद्भक्त्या तद् दानं कोटिसम्मितम् ॥

ऐसे लोगोंके घरपर स्वयं उपस्थित होकर भक्तिपूर्वक विशेषरूपसे दान देना चाहिये। वह दान साधारण दानकी अपेक्षा करोड़गुना फल देनेवाला माना गया है ।।
जाग्रतः स्वपतो वापि प्रवासेषु गृहेष्वथ ।
हृदये न प्रणश्यामि यस्य विप्रस्य भावतः ।।
स पूजितो वा दृष्टो वा स्पृष्टो वापि द्विजोत्तमः ।
सम्भाषितो वा राजेन्द्र पुनात्येवं नरं सदा ।।
राजेन्द्र! जागते अथवा सोते समय, परदेशमें अथवा घर रहते समय जिस ब्राह्मणके हृदयसे उसकी भक्ति-भावनाके कारण मैं कभी दूर नहीं होता, ऐसा वह श्रेष्ठ ब्राह्मण पूजन, दर्शन, स्पर्श अथवा सम्भाषण करने मात्रसे मनुष्यको सदा पवित्र कर देता है ।।
एवं सर्वास्ववस्थासु सर्वदानानि पाण्डव ।
मद्भक्तेभ्यः प्रदत्तानि स्वर्गमार्गप्रदानि वै ।।
पाण्डव! इस प्रकार सब अवस्थाओंमें मेरे भक्तोंको दिये हुए सब प्रकारके दान स्वर्गमार्ग प्रदान करनेवाले होते हैं ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन]

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[बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन]

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैवं सात्त्विकं दानं राजसं तामसं तथा ।
पृथक्पृथक्त्वेन गतिं फलं चापि पृथक् पृथक् ॥
अवितृप्तः प्रहृष्टात्मा पुण्यं धर्मामृतं पुनः ।
युधिष्ठिरो धर्मरतः केशवं पुनरब्रवीत् ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार सात्त्विक, राजस और तामस दान, उसकी भिन्न-भिन्न गति और पृथक्-पृथक् फलका वर्णन सुनकर धर्मपरायण युधिष्ठिरका चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। इस परम पवित्र धर्मरूपी अमृतका पान करनेसे उन्हें तृप्ति नहीं हुई, अतः वे पुनः भगवान् श्रीकृष्णसे बोले— ॥

बीजयोनिविशुद्धानां लक्षणानि वदस्व मे ।
बीजदोषेण लोकेश जायन्ते च कथं नराः ॥
‘जगदीश्वर! मुझे यह बतलाइये कि बीज और योनि (वीर्य और रज)-से शुद्ध पुरुषोंके लक्षण कैसे होते हैं? बीज-दोषसे कैसे मनुष्य उत्पन्न होते हैं? ।।

आचारदोषं देवेश वक्तुमर्हस्यशेषतः ।
ब्राह्मणानां विशेषं च गुणदोषौ च केशव ॥
‘देवेश्वर श्रीकृष्ण! ब्राह्मणोंके उत्तम, मध्यम आदि विशेष भेदोंका, उनके आचारके दोषोंका तथा उनके गुण-दोषोंका भी सम्पूर्णतया वर्णन कीजिये ।।

श्रीभगवानुवाच

शृणु राजन् यथावृत्तं बीजयोनिं शुभाशुभम् ।
येन तिष्ठति लोकोऽयं विनश्यति च पाण्डव ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**राजन्! बीज और योनिकी शुद्धि-अशुद्धिका यथावत् वर्णन सुनो। पाण्डुनन्दन! उनकी शुद्धिसे ही यह संसार टिकता है और अशुद्धिसे उसका नाश हो जाता है ।।

अविप्लुतब्रह्मचर्यो यस्तु विप्रो यथाविधि ।
स बीजं नाम विज्ञेयं तस्य बीजं शुभं भवेत् ॥
जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यका विधिवत् पालन करता है, जिसका ब्रह्मचर्यव्रत कभी खण्डित नहीं होता, उसको बीज समझना चाहिये, उसीका बीज शुभ होता है ।।

कन्या चाक्षतयोनिः स्यात् कुलीना पितृमातृतः ।
ब्राह्मादिषु विवाहेषु परिणीता यथाविधि ॥
सा प्रशस्ता वरारोहा तस्याः योनिः प्रशस्यते ।

मनसा कर्मणा वाचा या गच्छेत् परपूरुषम् ।
योनिस्तस्या नरश्रेष्ठ गर्भाधानं न चार्हति ॥
इसी प्रकार जो कन्या पिता और माताकी दृष्टिसे उत्तम कुलमें उत्पन्न हो, जिसकी योनि दूषित न हुई हो तथा ब्राह्म आदि उत्तम विवाहोंकी विधिसे ब्याही गयी हो, वह उत्तम स्त्री मानी गयी है। उसीकी योनि श्रेष्ठ है। नरश्रेष्ठ! जो स्त्री मन, वाणी और क्रियासे परपुरुषके साथ समागम करती है, उसकी योनि गर्भाधानके योग्य नहीं होती ॥

दैवे पित्र्ये तथा दाने भोजने सहभाषणे ।
शयने सह सम्बन्धे न योग्या दुष्टयोनिजाः ॥
दूषित योनिसे उत्पन्न हुए मनुष्य यज्ञ, श्राद्ध, दान, भोजन, वार्तालाप, शयन तथा सम्बन्ध आदिमें सम्मिलित करने योग्य नहीं होते ॥

कानीनश्च सहोढश्च तथोभौ कुण्डगोलकौ ।
आरूढपतिताज्जातः पतितस्यापि यः सुतः ।
षडेते विप्रचाण्डाला निकृष्टाः श्वपचादपि ॥
बिना ब्याही कन्यासे उत्पन्न, ब्याहके समय गर्भवती कन्यासे उत्पन्न, पतिकी जीवितावस्थामें व्यभिचारसे उत्पन्न, पतिके मर जानेपर पर-पुरुषसे उत्पन्न, संन्यासीके वीर्यसे उत्पन्न तथा पतित मनुष्यसे उत्पन्न—ये छः प्रकारके चाण्डाल ब्राह्मण होते हैं, जो चाण्डालसे भी नीच हैं ॥

यो यत्र तत्र वा रेतः सिक्त्वा शूद्रासु वा चरेत् ।
कामचारी स पापात्मा बीजं तस्याशुभं भवेत् ॥
जो जहाँ-तहाँ जिस किसी स्त्रीसे अथवा शूद्र जातिकी स्त्रीसे भी समागम कर लेता है, वह पापात्मा स्वेच्छाचारी कहलाता है। उसका बीज अशुभ होता है ॥

अशुद्धं तद् भवेद् बीजं शुद्धां योनिं न चार्हति ।
दूषयत्यपि तां योनिं शुना लीढं हविर्यथा ॥
वह अशुद्ध वीर्य किसी शुद्ध योनिवाली स्त्रीके योग्य नहीं होता, उसके सम्पर्कसे कुत्तेके चाटे हुए हविष्यकी तरह शुद्ध योनि भी दूषित हो जाती है ॥

आत्मा हि शुक्रमुद्दिष्टं दैवतं परमं महत् ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन निरुन्ध्याच्छुक्रमात्मनः ॥
वीर्यको आत्मा बताया गया है। वह सबसे श्रेष्ठ देवता है। इसलिये सब प्रकारका प्रयत्न करके अपने वीर्यकी रक्षा करनी चाहिये ॥

आयुस्तेजो बलं वीर्यं प्रज्ञा श्रीश्च महद् यशः ।
पुण्यं च मत्प्रियत्वं च लभते ब्रह्मचर्यया ॥
मनुष्य ब्रह्मचर्यके पालनसे आयु, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, महान् यश, पुण्य और मेरे प्रेमको प्राप्त करता है ॥

अविप्लुतब्रह्मचर्यैर्गृहस्थाश्रममाश्रितैः । पञ्चयज्ञपरैर्धर्मः स्थाप्यते पृथिवीतले ॥ जो गृहस्थ-आश्रममें स्थित होकर अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पञ्चयज्ञोंके अनुष्ठानमें तत्पर रहते हैं, वे पृथ्वीतलपर धर्मकी स्थापना करते हैं ॥ सायं प्रातस्तु ये संध्यां सम्यग्नित्यमुपासते । नावं वेदमयीं कृत्वा तरन्ते तारयन्ति च ॥ जो प्रतिदिन सबेरे और शामको विधिवत् संध्योपासना करते हैं, वे वेदमयी नौकाका सहारा लेकर इस संसार-समुद्रसे स्वयं भी तर जाते हैं और दूसरोंको भी तार देते हैं ॥ यो जपेत् पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम् । न सीदेत् प्रतिगृह्णानः पृथिवीं च ससागराम् ॥ जो ब्राह्मण सबको पवित्र बनानेवाली वेदमाता गायत्रीदेवीका जप करता है, वह समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका दान लेनेपर भी प्रतिग्रहके दोषसे दुखी नहीं होता ॥ ये चास्य दुःस्थिताः केचिद् ग्रहाः सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शुभकरास्तथा ॥ तथा सूर्य आदि ग्रहोंमेंसे जो उसके लिये अशुभ स्थानमें रहकर अनिष्टकारक होते हैं, वे भी गायत्री-जपके प्रभावसे शान्त, शुभ और कल्याणकारी फल देनेवाले हो जाते हैं ॥ यत्र यत्र स्थिताश्चैव दारुणाः पिशिताशनाः । घोररूपा महाकाया धर्षयन्ति न तं द्विजम् ॥ जहाँ कहीं क्रूर कर्म करनेवाले भयंकर विशालकाय पिशाच रहते हैं, वहाँ जानेपर भी वे उस ब्राह्मणका अनिष्ट नहीं कर सकते ॥ पुनन्तीह पृथिव्यां च चीर्णवेदव्रता नराः । चतुर्णामपि वेदानां सा हि राजन् गरीयसी ॥ वैदिक व्रतोंका आचरण करनेवाले पुरुष पृथ्वीपर दूसरोंको पवित्र करनेवाले होते हैं। राजन्! चारों वेदोंमें वह गायत्री श्रेष्ठ है ॥ अचीर्णव्रतवेदा ये विकर्मफलमाश्रिताः । ब्राह्मणा नाममात्रेण तेऽपि पूज्या युधिष्ठिर । किं पुनर्यस्तु संध्ये द्वे नित्यमेवोपतिष्ठते ॥ युधिष्ठिर! जो ब्राह्मण न तो ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं और न वेदाध्ययन करते हैं, जो बुरे फलवाले कर्मोंका आश्रय लेते हैं, वे नाममात्रके ब्राह्मण भी गायत्रीके जपसे पूज्य हो जाते हैं। फिर जो ब्राह्मण प्रातः-सायं दोनों समय संध्या-वन्दन करते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है? ॥ शीलमध्ययनं दानं शौचं मार्दवमार्जवम् । तस्माद् वेदाद् विशिष्टानि मनुरह प्रजापतिः ॥

प्रजापति मनुका कहना है कि—'शील, स्वाध्याय, दान, शौच, कोमलता और सरलता—ये सद्गुण ब्राह्मणके लिये वेदसे भी बढ़कर हैं।।'
भूर्भुवः स्वरिति ब्रह्म यो वेदनिरतो द्विजः ।
स्वदारनिरतो दान्तः स विद्वान् स च भूसुरः ॥
जो ब्राह्मण ‘भूर्भुवः स्वः’ इन व्याहृतियोंके साथ गायत्रीका जप करता है, वेदके स्वाध्यायमें संलग्न रहता है और अपनी ही स्त्रीसे प्रेम करता है, वही जितेन्द्रिय, वही विद्वान् और वही इस भूमण्डलका देवता है ।।
संध्यामुपासते ये वै नित्यमेव द्विजोत्तमाः ।
ते यान्ति नरशार्दूल ब्रह्मलोकं न संशयः ॥
पुरुषसिंह! जो श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रतिदिन संध्योपासन करते हैं, वे निःसंदेह ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं ।।
सावित्रीमात्रसारोऽपि वरो विप्रः सुयन्त्रितः ।
नायन्त्रितश्चतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥
केवल गायत्रीमात्र जाननेवाला ब्राह्मण भी यदि नियमसे रहता है तो वह श्रेष्ठ है; किंतु जो चारों वेदोंका विद्वान् होनेपर भी सबका अन्न खाता है, सब कुछ बेचता है और नियमोंका पालन नहीं करता है, वह उत्तम नहीं माना जाता ।।
सावित्रीं चैव वेदांश्च तुलयातोलयन् पुरा ।
सदेवर्षिगणाश्चैव सर्वे ब्रह्मपुरःसराः ।
चतुर्णामपि वेदानां सा हि राजन् गरीयसी ॥
राजन्! पूर्वकालमें देवता और ऋषियोंने ब्रह्माजीके सामने गायत्री-मन्त्र और चारों वेदोंको तराजूपर रखकर तौला था। उस समय गायत्रीका पलड़ा ही चारों वेदोंसे भारी साबित हुआ ।।
यथा विकसिते पुष्पे मधु गृह्णन्ति षट्पदाः ।
एवं गृहीता सावित्री सर्ववेदे च पाण्डव ॥
पाण्डव! जैसे भ्रमर खिले हुए फूलोंसे उनके सारभूत मधुको ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण वेदोंसे उनके सारभूत गायत्रीका ग्रहण किया गया है ।।
तस्मात् तु सर्ववेदानां सावित्री प्राण उच्यते ।
निर्जीवा हीतरे वेदा विना सावित्रिया नृप ॥
इसलिये गायत्री सम्पूर्ण वेदोंका प्राण कहलाती है। नरेश्वर! गायत्रीके बिना सभी वेद निर्जीव हैं ।।
नायन्त्रितश्चतुर्वेदी शीलभ्रष्टः स कुत्सितः ।
शीलवृत्तसमायुक्तः सावित्रीपाठको वरः ॥

नियम और सदाचारसे भ्रष्ट ब्राह्मण चारों वेदोंका विद्वान् हो तो भी वह निन्दाका ही पात्र है, किंतु शील और सदाचारसे युक्त ब्राह्मण यदि केवल गायत्रीका जप करता हो तो भी वह श्रेष्ठ माना जाता है ।। सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां शतावराम् । सावित्रीं जप कौन्तेय सर्वपापप्रणाशिनीम् ।। प्रतिदिन एक हजार गायत्री-मन्त्रका जप करना उत्तम है, सौ मन्त्रका जप करना मध्यम और दस मन्त्रका जप करना कनिष्ठ माना गया है। कुन्तीनन्दन! गायत्री सब पापोंको नष्ट करनेवाली है, इसलिये तुम सदा उसका जप करते रहो ।।

युधिष्ठिर उवाच त्रैलोक्यनाथ हे कृष्ण सर्वभूतात्मको ह्यसि । नानायोगपर श्रेष्ठ तुष्यसे केन कर्मणा ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**त्रिलोकीनाथ! आप सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं। विभिन्न योगोंके द्वारा प्राप्तव्य सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्ण! बताइये, किस कर्मसे आप संतुष्ट होते हैं? ।।

श्रीभगवानुवाच यदि भारसहस्रं तु गुग्गुल्वादि प्रधूपयेत् । करोति चेन्नमस्कारमुपहारं च कारयेत् ।। स्तौति यः स्तुतिभिर्मां च ऋग्यजुःसामभिः सदा । न तोषयति चेद् विप्रान् नाहं तुष्यामि भारत ।। **श्रीभगवान्ने कहा—**भारत! कोई एक हजार भार गुग्गुल आदि सुगन्धित पदार्थोंको जलाकर मुझे धूप दे, निरन्तर नमस्कार करे, खूब भेंट-पूजा चढ़ावे तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी स्तुतियोंसे सदा मेरा स्तवन करता रहे; किंतु यदि वह ब्राह्मणको संतुष्ट न कर सका तो मैं उसपर प्रसन्न नहीं होता ।। ब्राह्मणे पूजिते नित्यं पूजितोऽस्मि न संशयः । आक्रुष्टे चाहमाक्रुष्टो भवामि भरतर्षभ ।। भरतश्रेष्ठ! इसमें संदेह नहीं कि ब्राह्मणकी पूजासे सदा मेरी भी पूजा हो जाती है और ब्राह्मणको कटुवचन सुनानेसे मैं ही उस कटुवचनका लक्ष्य बनता हूँ ।। परा मयि गतिस्तेषां पूजयन्ति द्विजं हि ये । यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले ।। जो ब्राह्मणकी पूजा करते हैं, उनकी परमगति मुझमें ही होती है; क्योंकि पृथ्वीपर ब्राह्मणोंके रूपमें मैं ही निवास करता हूँ ।। यस्तान् पूजयति प्राज्ञो मद्गतेनान्तरात्मना । तमहं स्वेन रूपेण पश्यामि नरपुङ्गव ।।

पुरुषश्रेष्ठ! जो बुद्धिमान् मनुष्य मुझमें मन लगाकर ब्राह्मणोंकी पूजा करता है, उसको मैं अपना स्वरूप ही समझता हूँ।। कुब्जाः काणा वामनाश्च दरिद्रा व्याधितास्तथा। नावमान्या द्विजाः प्राज्ञैर्मम रूपा हि ते द्विजाः।। ब्राह्मण यदि कुबड़े, काने, बौने, दरिद्र और रोगी भी हों तो विद्वान् पुरुषोंको कभी उनका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सब मेरे ही स्वरूप हैं।। ये केचित् सागरान्तायां पृथिव्यां द्विजसत्तमाः। मम रूपं हि तेष्वेवमर्चितेष्वर्चितोऽस्म्यहम्।। समुद्रपर्यन्त पृथ्वीके ऊपर जितने भी श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, वे सब मेरे स्वरूप हैं। उनका पूजन करनेसे मेरा भी पूजन हो जाता है।। बहवस्तु न जानन्ति नरा ज्ञानबहिष्कृताः। यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले।। बहुत-से अज्ञानी पुरुष इस बातको नहीं जानते कि मैं इस पृथ्वीपर ब्राह्मणोंके रूपमें निवास करता हूँ।। आक्रोशपरिवादाभ्यां ये रमन्ते द्विजातिषु। तान् मृतान् यमलोकस्थान् निपात्य पृथिवीतले।। आक्रम्योरसि पादेन क्रूरः संरक्तलोचनः। अग्निवर्णैस्तु संदंशैर्यमो जिह्वां समुद्धरेत्।। जो ब्राह्मणोंको गाली देकर और उनकी निन्दा करके प्रसन्न होते हैं, वे जब यमलोकमें जाते हैं तब लाल-लाल आँखोंवाले क्रूर यमराज उन्हें पृथ्वीपर पटककर छातीपर सवार हो जाते हैं और आगमें तपाये हुए सँड़सोंसे उनकी जीभ उखाड़ लेते हैं।। ये च विप्रान् निरीक्षन्ते पापाः पापेन चक्षुषा। अब्रह्मण्याः श्रुतेर्बाह्या नित्यं ब्रह्मद्विषो नराः।। तेषां घोरा महाकाया वक्रतुण्डा महाबलाः। उद्धरन्ति मुहूर्तेन खगाश्चक्षुर्यमाज्ञया।। जो पापी ब्राह्मणोंकी ओर पापपूर्ण दृष्टिसे देखते हैं, ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति नहीं करते, वैदिक मर्यादाका उल्लंघन करते हैं और सदा ब्राह्मणोंके द्वेषी बने रहते हैं, वे जब यमलोकमें पहुँचते हैं तब वहाँ यमराजकी आज्ञासे टेढ़ी चोंचवाले बड़े-बड़े बलवान् पक्षी आकर क्षणभरमें उन पापियोंकी आँखें निकाल लेते हैं।। यः प्रहारं द्विजेन्द्राय दद्यात् कुर्याच्च शोणितम्। अस्थिभङ्गं च यः कुर्यात् प्राणैर्वा विप्रयोजयेत्। सोऽऽनुपूर्व्येण यातीमान् नरकानेकविंशतिम्।।

जो मनुष्य ब्राह्मणको पीटता है, उसके शरीरसे खून निकाल देता है, उसकी हड्डी तोड़ डालता है अथवा उसके प्राण ले लेता है, वह क्रमशः इक्कीस नरकोंमें अपने पापका फल भोगता है ।।

शूलमारोप्यते पश्चाज्ज्वलने परिपच्यते ।
बहुवर्षसहस्राणि पच्यमानस्त्ववाक्शिराः ।
नावमुच्येत दुर्मेधा न तस्य क्षीयते गतिः ॥

पहले वह शूलपर चढ़ाया जाता है। फिर मस्तक नीचे करके उसे आगमें लटका दिया जाता है और वह हजारों वर्षोंतक उसमें पकता रहता है। वह दुष्ट-बुद्धिवाला पुरुष उस दारुण यातनासे तबतक छुटकारा नहीं पाता, जबतक कि उसके पापका भोग समाप्त नहीं हो जाता ।।

ब्राह्मणान् वा विचार्यैव व्रजन् वै वधकाङ्क्षया ।
शतवर्षसहस्राणि तामिस्रे परिपच्यते ॥

ब्राह्मणोंका अपमान करनेके विचारसे अथवा उनको मारनेकी इच्छासे जो उनपर आक्रमण करते हैं, वे एक लाख वर्षतक तामिस्र नरकमें पकाये जाते हैं ।।

तस्मान्नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गतिमीरयेत् ।
न ब्रूयात् परुषां वाणीं न चैवैनान्तिक्रमेत् ॥

इसलिये ब्राह्मणोंके प्रति कभी अमंगलसूचक वचन न कहे, उनसे रूखी और कठोर बात न बोले तथा कभी उनका अपमान न करे ।।

ये विप्रान् श्लक्ष्णया वाचा पूजयन्ति नरोत्तमाः ।
अर्चितश्च स्तुतश्चैव तैर्भवामि न संशयः ॥

जो श्रेष्ठ मनुष्य ब्राह्मणोंकी मधुर वाणीसे पूजा करते हैं, उनके द्वारा निःसंदेह मेरी ही पूजा और स्तुति-क्रिया सम्पन्न हो जाती है ।।

तर्जयन्ति च ये विप्रान् कोशयन्ति च भारत ।
आकृष्टस्तर्जितश्चाहं तैर्भवामि न संशयः ॥

भारत! जो ब्राह्मणोंको फटकारते और गालियाँ सुनाते हैं, वे मुझे ही गाली देते और मुझे ही फटकारते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

मानुषस्य च लोकस्य धर्मलोकस्य चान्तरम् ॥

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[यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय]

युधिष्ठिर उवाच

देवदेवेश दैत्यघ्न परं कौतूहलं हि मे ।
एतत् कथय सर्वज्ञ त्वद्भक्तस्य च केशव ।
मानुषस्य च लोकस्य धर्मलोकस्य चान्तरम् ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**दैत्योंका विनाश करनेवाले देवदेवेश्वर! मेरे मनमें सुननेकी बड़ी उत्कण्ठा है। मैं आपका भक्त हूँ। केशव! आप सर्वज्ञ हैं, इसलिये बतलाइये, मनुष्यलोकके और यमलोकके बीचकी दूरी कितनी है? ॥

त्वगस्थिमांसनिर्मुक्ते पञ्चभूतविवर्जिते ।
कथयस्व महादेव सुखदुःखमशेषतः ॥
सर्वश्रेष्ठ देव! जब जीव पाञ्चभौतिक शरीरसे अलग होकर त्वचा, हड्डी और मांससे रहित हो जाता है, उस समय उसे समस्त सुख-दुःखका अनुभव किस प्रकार होता है? ॥

जीवस्य कर्मलोकेषु कर्माभिस्तु शुभाशुभैः ।
अनुबद्धस्य तैः पाशैर्नीयमानस्य दारुणैः ॥
मृत्युदूतैर्दुराधर्षैर्घोरैर्घोरपराक्रमैः ।
वद्धस्याक्षिप्यमाणस्य विद्रुतस्य यमाज्ञया ॥
सुना जाता है कि मनुष्यलोकमें जीव अपने शुभाशुभ कर्मोंसे बँधा हुआ है। उसे मरनेके बाद यमराजकी आज्ञासे भयंकर, दुर्धर्ष और घोर पराक्रमी यमदूत कठिन पाशोंसे बाँधकर मारते-पीटते हुए ले जाते हैं। वह इधर-उधर भागनेकी चेष्टा करता है ॥

पुण्यपापकृतस्तिष्ठेत् सुखदुःखमशेषतः ।
यमदूतैर्दुराधर्षैर्नीयते वा कथं पुनः ॥
वहाँ पुण्य-पाप करनेवाले सब तरहके सुख-दुःख भोगते हैं; अतः बतलाइये, मरे हुए प्राणीको दुर्धर्ष यमदूत किस प्रकार ले जाते हैं? ॥

किं रूपं किं प्रमाणं वा वर्णः को वास्य केशव ।
जीवस्य गच्छतो नित्यं यमलोकं वदस्व मे ॥
केशव! यमलोकमें जाते समय जीवका निश्चित रूप-रंग कैसा होता है? और उसका शरीर कितना बड़ा होता है? ये सब बातें बताइये ॥

श्रीभगवानुवाच

शृणु राजन् यथावृत्तं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि मद्भक्तस्य नरेश्वर ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**राजन्! नरेश्वर! तुम मेरे भक्त हो, इसलिये जो कुछ पूछते हो, वह सब बात यथार्थरूपसे बता रहा हूँ; सुनो ॥

षडशीतिसहस्राणि योजनानां युधिष्ठिर ।
मानुषस्य च लोकस्य यमलोकस्य चान्तरम् ॥
युधिष्ठिर! मनुष्यलोक और यमलोकमें छियासी हजार योजनका अन्तर है ॥
न तत्र वृक्षच्छाया वा न तटाकं सरोऽपि वा ।
न वाप्यो दीर्घिका वापि न कूपो वा युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! इस बीचके मार्गमें न वृक्षकी छाया है, न तालाब है, न पोखरा है, न बावड़ी है और न कुआँ ही है ॥
न मण्डपं सभा वापि न प्रपा न निकेतनम् ।
न पर्वतो नदी वापि न भूमेर्विवरं क्वचित् ॥
न ग्रामो नाश्रमो वापि नोद्यानं वा वनानि च ।
न किंचिदाश्रयस्थानं पथि तस्मिन् युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! उस मार्गमें कहीं भी कोई मण्डप, बैठक, प्याऊ, घर, पर्वत, नदी, गुफा, गाँव, आश्रम, बगीचा, वन अथवा ठहरनेका दूसरा कोई स्थान भी नहीं है ॥
जन्तोर्हि प्राप्तकालस्य वेदनार्तस्य वै भृशम् ।
कारणैस्त्यक्तदेहस्य प्राणैः कण्ठगतैः पुनः ॥
शरीराच्चाल्यते जीवो ह्यवशो मातरिश्वना ।
निर्गतो वायुभूतस्तु षट्कोशात् तु कलेवरात् ॥
शरीरमन्यत् तद्रूपं तद्वर्णं तत्प्रमाणतः ।
अदृश्यं तत्प्रविष्टस्तु सोऽप्यदृष्टोऽथ केनचित् ॥
जब जीवका मृत्युकाल उपस्थित होता है और वह वेदनासे अत्यन्त छटपटाने लगता है, उस समय कारण-तत्त्व शरीरका त्याग कर देते हैं, प्राण कण्ठतक आ जाते हैं और वायुके वशमें पड़े हुए जीवको बरबस इस शरीरसे निकल जाना पड़ता है। छः कोशोंवाले शरीरसे निकलकर वायुरूपधारी जीव एक दूसरे अदृश्य शरीरमें प्रवेश करता है। उस शरीरके रूप, रंग और माप भी पहले शरीरके ही समान होते हैं। उसमें प्रविष्ट होनेपर जीवको कोई देख नहीं पाता ॥
सोऽन्तरात्मा देहवतामष्टाङ्गो यस्तु संचरेत् ।
छेदनाद् भेदनाद् दाहात् ताडनाद् वा न नश्यति ॥
देहधारियोंका अन्तरात्मा जीव आठ अंगोंसे युक्त होकर यमलोककी यात्रा करता है। वह शरीर काटने, टुकड़े-टुकड़े करने, जलाने अथवा मारनेसे नष्ट नहीं होता ॥
नानारूपधरैर्घोरैः प्रचण्डैश्चण्डसाधनैः ।
नीयमानो दुराधर्षैर्यमदूतैर्यमाज्ञया ॥
यमराजकी आज्ञासे नाना प्रकारके भयंकर रूपधारी अत्यन्त क्रोधी और दुर्धर्ष यमदूत प्रचण्ड हथियार लिये आते हैं और जीवको जबरदस्ती पकड़कर ले जाते हैं ॥

पुत्रदारमयैः पाशैः संनिरुद्धोऽवशो बलात् । स्वकर्मभिश्चानुगतः कृतैः सुकृतदुष्कृतैः ॥ उस समय जीव स्त्री-पुत्रादिके स्नेह-बन्धनमें आबद्ध रहता है। जब विवश हुआ वह ले जाया जाता है, तब उसके किये हुए पाप-पुण्य उसके पीछे-पीछे जाते हैं ॥

आक्रन्दमानः करुणं बन्धुभिर्दुःखपीडितैः । त्यक्त्वा बन्धुजनं सर्वं निरपेक्षस्तु गच्छति ॥ उस समय उसके बन्धु-बान्धव दुःखसे पीड़ित होकर करुणाजनक स्वरमें विलाप करने लगते हैं तो भी वह सबकी ओरसे निरपेक्ष हो समस्त बन्धु-बान्धवोंको छोड़कर चल देता है ॥

मातृभिः पितृभिश्चैव भ्रातृभिर्मातुलैस्तथा । दारैः पुत्रैर्वयस्यैश्च रुदद्भिरित्यज्यते पुनः ॥ माता, पिता, भाई, मामा, स्त्री, पुत्र और मित्र रोते रह जाते हैं, उनका साथ छूट जाता है ॥

अदृश्यमानस्तैर्दीनैराश्रुपूर्णमुखेक्षणैः । स्वशरीरं परित्यज्य वायुभूतस्तु गच्छति ॥ उनके नेत्र और मुख आँसुओंसे भीगे होते हैं। उनकी दशा बड़ी दयनीय हो जाती है, फिर भी वह जीव उन्हें दिखायी नहीं पड़ता। वह अपना शरीर छोड़कर वायुरूप हो चल देता है ॥

अन्धकारमपारं तं महाघोरं तमोवृतम् । दुःखान्तं दुष्प्रतारं च दुर्गमं पापकर्मणाम् ॥ वह पापकर्म करनेवालोंका मार्ग अन्धकारसे भरा है और उसका कहीं पार नहीं दिखायी देता। वह मार्ग बड़ा भयंकर, तमोमय, दुस्तर, दुर्गम और अन्ततक दुःख-ही-दुःख देनेवाला है ॥

देवासुरैर्मनुष्याद्यैर्वैवस्वतवशानुगैः । स्त्रीपुंनपुंसकैश्चापि पृथिव्यां जीवसंज्ञितैः ॥ मध्यमैर्युवभिर्वापि बालैर्वृद्धैस्तथैव च । जातमात्रैश्च गर्भस्थैर्गन्तव्यः स महापथः ॥ यमराजके अधीन रहनेवाले देवता, असुर और मनुष्य आदि जो भी जीव पृथ्वीपर हैं, वे स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक हों, बाल, वृद्ध, तरुण या जवान हों, तुरंतके पैदा हुए हों अथवा गर्भमें स्थित हों, उन सबको एक दिन उस महान् पथकी यात्रा करनी ही पड़ती है ॥

पूर्वाह्ने वा पराह्ने वा संध्याकालेऽथवा पुनः । प्रदोषे वार्धरात्रे वा प्रत्यूषे वाप्युपस्थिते ॥

पूर्वाह्न हो या पराह्न, संध्याका समय हो या रात्रिका, आधी रात हो या सबेरा हो गया हो, वहाँकी यात्रा सदा खुली ही रहती है ।। मृत्युदूतैर्दुराधर्षैः प्रचण्डैश्चण्डशासनैः । आक्षिप्यमाणा ह्यवशाः प्रयान्ति यमसादनम् ।। उपर्युक्त सभी प्राणी दुर्धर्ष, उग्र शासन करनेवाले प्रचण्ड यमदूतोंके द्वारा विवश होकर मार खाते हुए यमलोक जाते हैं ।। क्वचिद् भीतैः क्वचिन्मत्तैः प्रस्खलद्भिः क्वचित् क्वचित् । क्रन्दद्भिर्वेदनातैंस्तु गन्तव्यं यमसादनम् ।। यमलोकके पथपर कहीं डरकर, कहीं पागल होकर, कहीं ठोकर खाकर और कहीं वेदनासे आर्त होकर रोते-चिल्लाते हुए चलना पड़ता है ।। निर्भर्त्स्यमानैरुद्विग्नैर्विधूतैर्भयविह्वलैः । तुद्यमानशरीरैश्च गन्तव्यं तर्जितैस्तथा ।। यमदूतोंकी डाँट सुनकर जीव उद्विग्न हो जाते हैं और भयसे विह्वल हो थर-थर काँपने लगते हैं। दूतोंकी मार खाकर शरीरमें बेतरह पीड़ा होती है तो भी उनकी फटकार सुनते हुए आगे बढ़ना पड़ता है ।। काष्ठोपलशिलाघातैर्दण्डोल्मुककशाङ्कुशैः । हन्यमानैर्यमपुरं गन्तव्यं धर्मवर्जितैः ।। धर्महीन पुरुषोंको काठ, पत्थर, शिला, डंडे, जलती लकड़ी, चाबुक और अंकुशकी मार खाते हुए यमपुरीको जाना पड़ता है ।। वेदनातैँश्च कूजद्भिर्विक्रोशद्भिंश्च विस्वरम् । वेदनातैः पतद्भिश्च गन्तव्यं जीवघातकैः ।। जो दूसरे जीवोंकी हत्या करते हैं, उन्हें इतनी पीड़ा दी जाती है कि वे आर्त होकर छटपटाने, कराहने तथा जोर-जोरसे चिल्लाने लगते हैं और उसी स्थितिमें उन्हें गिरते-पड़ते चलना पड़ता है ।। शक्तिभिर्भिन्दिपालैश्च शङ्कुतोमरसायकैः । तुद्यमानस्तु शूलाग्रैर्गन्तव्यं जीवघातकैः ।। चलते समय उनके ऊपर शक्ति, भिन्दिपाल, शंकु, तोमर, बाण और त्रिशूलकी मार पड़ती रहती है ।। श्वभिर्व्याघ्रैर्वृकैः काकैर्भक्ष्यमाणाः समन्ततः । तुद्यमानाश्च गच्छन्ति राक्षसैर्मांसघातिभिः ।। कुत्ते, बाघ, भेड़िये और कौवे उन्हें चारों ओरसे नोचते रहते हैं। मांस काटनेवाले राक्षस भी उन्हें पीड़ा पहुँचाते हैं ।। महिषैश्च मृगैश्चापि सूकरैः पृषतैस्तथा ।

भक्ष्यमाणैस्तदध्वानं गन्तव्यं मांसखादकैः ।। जो लोग मांस खाते हैं, उन्हें उस मार्गमें चलते समय भैंसे, मृग, सूअर और चितकबरे हरिन चोट पहुँचाते और उनके मांस काटकर खाया करते हैं ।। सूचीसुतीक्ष्णतुण्डाभिर्मक्षिकाभिः समन्ततः । तुद्यमानैश्च गन्तव्यं पापिष्ठैर्बालघातकैः ।। जो पापी बालकोंकी हत्या करते हैं, उन्हें चलते समय सूईके समान तीखे डंकवाली मक्खियाँ चारों ओरसे काटती रहती हैं ।। विस्रब्धं स्वामिनं मित्रं स्त्रियं वा घ्नन्ति ये नराः । शस्त्रैर्निर्भिद्यमानैश्च गन्तव्यं यमसादनम् ।। जो लोग अपने ऊपर विश्वास करनेवाले स्वामी, मित्र अथवा स्त्रीकी हत्या करते हैं, उन्हें यमपुरके मार्गपर चलते समय यमदूत हथियारोंसे छेदते रहते हैं ।। खादयन्ति च ये जीवान् दुःखमापादयन्ति ते । राक्षसैश्च श्वभिश्चैव भक्ष्यमाणा व्रजन्ति ते ।। जो दूसरे जीवोंको भक्षण करते या उन्हें दुःख पहुँचाते हैं, उनको चलते समय राक्षस और कुत्ते काट खाते हैं ।। ये हरन्ति च वस्त्राणि शय्याः प्रावरणानि च । ते यान्ति विद्रुता नग्नाः पिशाचा इव तत्पथम् ।। जो दूसरोंके कपड़े, पलंग और बिछौने चुराते हैं, वे उस मार्गमें पिशाचोंकी तरह नंगे होकर भागते हुए चलते हैं ।। गाश्च धान्यं हिरण्यं वा बलात् क्षेत्रं गृहं तथा । ये हरन्ति दुरात्मानः परस्वं पापकारिणः ।। पाषाणैरुलमुकैर्दण्डैः काष्ठघातैश्च झर्झरैः । हन्यमानैः क्षताकीर्णैर्गन्तव्यं तैर्यमालयम् ।। जो दुरात्मा और पापाचारी मनुष्य बलपूर्वक दूसरोंकी गौ, अनाज, सोना, खेत और गृह आदिको हड़प लेते हैं, वे यमलोकमें जाते समय यमदूतोंके हाथसे पत्थर, जलती हुई लकड़ी, डंडे, काठ और बेंतकी छड़ियोंकी मार खाते हैं तथा उनके समस्त अंगोंमें घाव हो जाता है ।। ब्रह्मस्वं ये हरन्तीह नरा नरकनिर्भयाः ।। आक्रोशन्तीह ये नित्यं प्रहरन्ति च ये द्विजान् ।। शुष्ककण्ठा निबद्धास्ते छिन्नजिह्वाक्षिनासिका । पूयशोणितदुर्गन्धा भक्ष्यमाणाश्च जम्बुकैः ।। चण्डालैर्भीषणैश्चण्डैस्तुद्यमानाः समन्ततः । क्रोशन्तः करुणं घोरं गच्छन्ति यमसादनम् ।।

जो मनुष्य यहाँ नरकका भय न मानकर ब्राह्मणोंका धन छीन लेते हैं, उन्हें गालियाँ सुनाते हैं और सदा मारते रहते हैं, वे जब यमपुरके मार्गमें जाते हैं, उस समय यमदूत इस तरह जकड़कर बाँधते हैं कि उनका गला सूख जाता है; उनकी जीभ, आँख और नाक काट ली जाती है, उनके शरीरपर दुर्गन्धित पीब और रक्त डाला जाता है, गीदड़ उनके मांस नोच-नोचकर खाते हैं और क्रोधमें भरे हुए भयानक चाण्डाल उन्हें चारों ओरसे पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। इससे वे करुणायुक्त भीषण स्वरसे चिल्लाते रहते हैं ॥

तत्र चापि गताः पापा विष्ठाकूपेष्वनेकशतः ।
जीवन्तो वर्षकोटीस्तु क्लिश्यन्ते वेदनात् ततः ॥

यमलोकमें पहुँचनेपर भी उन पापियोंको जीते-जी विष्ठाके कुएँमें डाल दिया जाता है और वहाँ वे करोड़ों वर्षोंतक अनेक प्रकारसे पीड़ा सहते हुए कष्ट भोगते रहते हैं ॥

ततश्च मुक्ताः कालेन लोके चास्मिन् नराधमाः ।
विष्ठाकृमित्वं गच्छन्ति जन्मकोटिशतं नृप ॥

राजन्! तदनन्तर समयानुसार नरकयातनासे छुटकारा पानेपर वे इस लोकमें सौ करोड़ जन्मोंतक विष्ठाके कीड़े होते हैं ॥

अदत्तदाना गच्छन्ति शुष्ककण्ठास्यतालुकाः ।
अन्नं पानीयसहितं प्रार्थयन्तः पुनः पुनः ॥

दान न करनेवाले जीवोंके कण्ठ, मुँह और तालु भूख-प्यासके मारे सूखे रहते हैं तथा वे चलते समय यमदूतोंसे बारंबार अन्न और जल माँगा करते हैं ॥

स्वामिन् बुभुक्षात्तृष्णार्ता गन्तुं नैवाद्य शक्नुमः ।
ममान्नं दीयतां स्वामिन् पानीयं दीयतां मम ।
इति ब्रुवन्तस्तैर्दूतैः प्राप्यन्ते वै यमालयम् ॥

वे कहते हैं—'मालिक! हम भूख और प्याससे बहुत कष्ट पा रहे हैं, अब चला नहीं जाता; कृपा करके हमें अन्न और पानी दे दीजिये।' इस प्रकार याचना करते ही रह जाते हैं, किंतु कुछ भी नहीं मिलता। यमदूत उन्हें उसी अवस्थामें यमराजके घर पहुँचा देते हैं ॥

ब्राह्मणेभ्यः प्रदानानि नानारूपाणि पाण्डव ।
ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्ते सुखं यान्ति तत्फलम् ॥

पाण्डुपुत्र! जो ब्राह्मणोंको नाना प्रकारकी वस्तुएँ दान देते हैं, वे सुखपूर्वक उनके फलको प्राप्त करते हैं ॥

अन्नं ये च प्रयच्छन्ति ब्राह्मणेभ्यः सुसंस्कृतम् ।
श्रोत्रियेभ्यो विशेषेण प्रीत्या परमया युताः ॥
तैर्विमानैर्महात्मानो यान्ति चित्रैर्यमालयम् ।
सेव्यमाना वरस्त्रीभिरप्सतेभिर्महापथम् ॥

जो लोग ब्राह्मणोंको, उनमें भी विशेषतः श्रोत्रियोंको अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अच्छी प्रकारसे बनाये हुए उत्तम अन्नका भोजन कराते हैं, वे महात्मा पुरुष विचित्र विमानोंपर बैठकर यमलोककी यात्रा करते हैं। उस महान् पथमें सुन्दर स्त्रियाँ और अप्सराएँ उनकी सेवा करती रहती हैं ।।

ये च नित्यं प्रभाषन्ते सत्यं निष्कल्मषं वचः ।
ते च यान्त्यमलाभ्राभैर्विमानैर्वृषयोजितैः ॥
जो प्रतिदिन निष्कपटभावसे सत्यभाषण करते हैं, वे निर्मल बादलोंके समान बैल जुते हुए विमानोंद्वारा यमलोकमें जाते हैं ।।

कपिलाद्यानि पुण्यानि गोप्रदानानि ये नराः ।
ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छन्ति श्रोत्रियेभ्यो विशेषतः ॥
ते यान्त्यमलवर्णाभैर्विमानैर्वृषयोजितैः ।
वैवस्वतपुरं प्राप्य ह्याप्सरोभिर्निषेविताः ॥
जो ब्राह्मणोंको और उनमें भी विशेषतः श्रोत्रियोंको कपिला आदि गौओंका पवित्र दान देते रहते हैं, वे निर्मल कान्तिवाले बैल जुते हुए विमानोंमें बैठकर यमलोकको जाते हैं। वहाँ अप्सराएँ उनकी सेवा करती हैं ।।

उपानहौ च छत्रं च शयनान्यासनानि च ।
विप्रेभ्यो ये प्रयच्छन्ति वस्त्राण्याभरणानि च ॥
ते यान्त्यश्वैर्वृषैर्वापि कुञ्जरैरप्यलंकृताः ।
धर्मराजपुरं रम्यं सौवर्णच्छत्रशोभिताः ॥
जो ब्राह्मणोंको छाता, जूता, शय्या, आसन, वस्त्र और आभूषण दान करते हैं, वे सोनेके छत्र लगाये उत्तम गहनोंसे सज-धजकर घोड़े, बैल अथवा हाथीकी सवारीसे धर्मराजके सुन्दर नगरमें प्रवेश करते हैं ।।

ये फलानि प्रयच्छन्ति पुष्पाणि सुरभीणि च ।
हंसयुक्तैर्विमानैस्तु यान्ति धर्मपुरं नराः ॥
जो सुगन्धित फूल और फलका दान करते हैं, वे मनुष्य हंसयुक्त विमानोंके द्वारा धर्मराजके नगरमें जाते हैं ।।

ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो विचित्रान्नं घृताप्लुतम् ।
ते व्रजन्त्यमलाभ्राभैर्विमानैर्वायुवेगिभिः ।
पुरं तत् प्रेतनाथस्य नानाजनसमाकुलम् ॥
जो ब्राह्मणोंको घीमें तैयार किये हुए भाँति-भाँतिके पकवान दान करते हैं, वे वायुके समान वेगवाले सफेद विमानोंपर बैठकर नाना प्राणियोंसे भरे हुए यमपुरकी यात्रा करते हैं ।।

पानीयं ये प्रयच्छन्ति सर्वभूतप्रजीवनम् ।

ते सुतृप्ताः सुखं यान्ति भवनैर्हंसचोदितैः ॥
जो समस्त प्राणियोंको जीवन देनेवाले जलका दान करते हैं, वे अत्यन्त तृप्त होकर हंस जुते हुए विमानोंद्वारा सुखपूर्वक धर्मराजके नगरमें जाते हैं॥

ये तिलं तिलधेनुं वा घृतधेनुमथापि वा ।
श्रोत्रियेभ्यः प्रयच्छन्ति सौम्यभावसमन्विताः ॥
सूर्यमण्डलसंकाशैर्यानैस्ते यान्ति निर्मलैः ।
गीयमानैस्तु गन्धर्वैर्वैवस्वतपुरं नृप ॥
राजन्! जो लोग शान्तभावसे युक्त होकर श्रोत्रिय ब्राह्मणको तिल अथवा तिलकी गौ या घृतकी गौका दान करते हैं, वे सूर्यमण्डलके समान तेजस्वी निर्मल विमानोंद्वारा गन्धर्वोंके गीत सुनते हुए यमराजके नगरमें जाते हैं॥

तेषां वाप्यश्च कूपाश्च तटाकानि सरांसि च ।
दीर्घिकाः पुष्करिण्यश्च सजलाश्च जलाशयाः ॥
यानैस्ते यान्ति चन्द्राभैर्दिव्यघण्टानिनादितैः ।
चामरैस्तालवृन्तैश्च वीज्यमानाः महाप्रभाः ।
नित्यतृप्ता महात्मानो गच्छन्ति यमसादनम् ॥
जिन्होंने इस लोकमें बावड़ी, कुएँ, तालाब, पोखरे, पोखरियाँ और जलसे भरे हुए जलाशय बनवाये हैं, वे चन्द्रमाके समान उज्ज्वल और दिव्य घण्टानादसे निनादित विमानोंपर बैठकर यमलोकमें जाते हैं; उस समय वे महात्मा नित्यतृप्त और महान् कान्तिमान् दिखायी देते हैं तथा दिव्यलोकके पुरुष उन्हें ताड़के पंखे और चँवर डुलाया करते हैं॥

येषां देवगृहाणीह चित्राण्यायतनानि च ।
मनोहराणि कान्तानि दर्शनीयानि भान्ति च ॥
ते व्रजन्त्यमलाभ्राभैर्विमानैर्वायुवेगिभिः ।
तत्पुरं प्रेतनाथस्य नानाजनपदाकुलम् ॥
जिनके बनवाये हुए देवमन्दिर यहाँ अत्यन्त चित्र-विचित्र, विस्तृत, मनोहर, सुन्दर और दर्शनीय रूपमें शोभा पाते हैं, वे सफेद बादलोंके समान कान्तिमान् एवं हवाके समान वेगवाले विमानोंद्वारा नाना जनपदोंसे युक्त यमलोककी यात्रा करते हैं॥

वैवस्वतं च पश्यन्ति सुखचित्तं सुखस्थितम् ।
यमेन पूजिता यान्ति देवसालोक्यतां ततः ॥
वहाँ जानेपर वे यमराजको प्रसन्नचित्त और सुखपूर्वक बैठे हुए देखते हैं तथा उनके द्वारा सम्मानित होकर देवलोकके निवासी होते हैं॥

काष्ठपादुकदा यान्ति तदध्वानं सुखं नराः ।
सौवर्णमणिपीठे तु पादं कृत्वा रथोत्तमे ॥