महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2105, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय]
युधिष्ठिर उवाच
देवदेवेश दैत्यघ्न परं कौतूहलं हि मे ।
एतत् कथय सर्वज्ञ त्वद्भक्तस्य च केशव ।
मानुषस्य च लोकस्य धर्मलोकस्य चान्तरम् ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**दैत्योंका विनाश करनेवाले देवदेवेश्वर! मेरे मनमें सुननेकी बड़ी उत्कण्ठा है। मैं आपका भक्त हूँ। केशव! आप सर्वज्ञ हैं, इसलिये बतलाइये, मनुष्यलोकके और यमलोकके बीचकी दूरी कितनी है? ॥
त्वगस्थिमांसनिर्मुक्ते पञ्चभूतविवर्जिते ।
कथयस्व महादेव सुखदुःखमशेषतः ॥
सर्वश्रेष्ठ देव! जब जीव पाञ्चभौतिक शरीरसे अलग होकर त्वचा, हड्डी और मांससे रहित हो जाता है, उस समय उसे समस्त सुख-दुःखका अनुभव किस प्रकार होता है? ॥
जीवस्य कर्मलोकेषु कर्माभिस्तु शुभाशुभैः ।
अनुबद्धस्य तैः पाशैर्नीयमानस्य दारुणैः ॥
मृत्युदूतैर्दुराधर्षैर्घोरैर्घोरपराक्रमैः ।
वद्धस्याक्षिप्यमाणस्य विद्रुतस्य यमाज्ञया ॥
सुना जाता है कि मनुष्यलोकमें जीव अपने शुभाशुभ कर्मोंसे बँधा हुआ है। उसे मरनेके बाद यमराजकी आज्ञासे भयंकर, दुर्धर्ष और घोर पराक्रमी यमदूत कठिन पाशोंसे बाँधकर मारते-पीटते हुए ले जाते हैं। वह इधर-उधर भागनेकी चेष्टा करता है ॥
पुण्यपापकृतस्तिष्ठेत् सुखदुःखमशेषतः ।
यमदूतैर्दुराधर्षैर्नीयते वा कथं पुनः ॥
वहाँ पुण्य-पाप करनेवाले सब तरहके सुख-दुःख भोगते हैं; अतः बतलाइये, मरे हुए प्राणीको दुर्धर्ष यमदूत किस प्रकार ले जाते हैं? ॥
किं रूपं किं प्रमाणं वा वर्णः को वास्य केशव ।
जीवस्य गच्छतो नित्यं यमलोकं वदस्व मे ॥
केशव! यमलोकमें जाते समय जीवका निश्चित रूप-रंग कैसा होता है? और उसका शरीर कितना बड़ा होता है? ये सब बातें बताइये ॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु राजन् यथावृत्तं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि मद्भक्तस्य नरेश्वर ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**राजन्! नरेश्वर! तुम मेरे भक्त हो, इसलिये जो कुछ पूछते हो, वह सब बात यथार्थरूपसे बता रहा हूँ; सुनो ॥