भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2104, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2104

जो मनुष्य ब्राह्मणको पीटता है, उसके शरीरसे खून निकाल देता है, उसकी हड्डी तोड़ डालता है अथवा उसके प्राण ले लेता है, वह क्रमशः इक्कीस नरकोंमें अपने पापका फल भोगता है ।।

शूलमारोप्यते पश्चाज्ज्वलने परिपच्यते ।
बहुवर्षसहस्राणि पच्यमानस्त्ववाक्शिराः ।
नावमुच्येत दुर्मेधा न तस्य क्षीयते गतिः ॥

पहले वह शूलपर चढ़ाया जाता है। फिर मस्तक नीचे करके उसे आगमें लटका दिया जाता है और वह हजारों वर्षोंतक उसमें पकता रहता है। वह दुष्ट-बुद्धिवाला पुरुष उस दारुण यातनासे तबतक छुटकारा नहीं पाता, जबतक कि उसके पापका भोग समाप्त नहीं हो जाता ।।

ब्राह्मणान् वा विचार्यैव व्रजन् वै वधकाङ्क्षया ।
शतवर्षसहस्राणि तामिस्रे परिपच्यते ॥

ब्राह्मणोंका अपमान करनेके विचारसे अथवा उनको मारनेकी इच्छासे जो उनपर आक्रमण करते हैं, वे एक लाख वर्षतक तामिस्र नरकमें पकाये जाते हैं ।।

तस्मान्नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गतिमीरयेत् ।
न ब्रूयात् परुषां वाणीं न चैवैनान्तिक्रमेत् ॥

इसलिये ब्राह्मणोंके प्रति कभी अमंगलसूचक वचन न कहे, उनसे रूखी और कठोर बात न बोले तथा कभी उनका अपमान न करे ।।

ये विप्रान् श्लक्ष्णया वाचा पूजयन्ति नरोत्तमाः ।
अर्चितश्च स्तुतश्चैव तैर्भवामि न संशयः ॥

जो श्रेष्ठ मनुष्य ब्राह्मणोंकी मधुर वाणीसे पूजा करते हैं, उनके द्वारा निःसंदेह मेरी ही पूजा और स्तुति-क्रिया सम्पन्न हो जाती है ।।

तर्जयन्ति च ये विप्रान् कोशयन्ति च भारत ।
आकृष्टस्तर्जितश्चाहं तैर्भवामि न संशयः ॥

भारत! जो ब्राह्मणोंको फटकारते और गालियाँ सुनाते हैं, वे मुझे ही गाली देते और मुझे ही फटकारते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)