महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2103, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुरुषश्रेष्ठ! जो बुद्धिमान् मनुष्य मुझमें मन लगाकर ब्राह्मणोंकी पूजा करता है, उसको मैं अपना स्वरूप ही समझता हूँ।। कुब्जाः काणा वामनाश्च दरिद्रा व्याधितास्तथा। नावमान्या द्विजाः प्राज्ञैर्मम रूपा हि ते द्विजाः।। ब्राह्मण यदि कुबड़े, काने, बौने, दरिद्र और रोगी भी हों तो विद्वान् पुरुषोंको कभी उनका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सब मेरे ही स्वरूप हैं।। ये केचित् सागरान्तायां पृथिव्यां द्विजसत्तमाः। मम रूपं हि तेष्वेवमर्चितेष्वर्चितोऽस्म्यहम्।। समुद्रपर्यन्त पृथ्वीके ऊपर जितने भी श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, वे सब मेरे स्वरूप हैं। उनका पूजन करनेसे मेरा भी पूजन हो जाता है।। बहवस्तु न जानन्ति नरा ज्ञानबहिष्कृताः। यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले।। बहुत-से अज्ञानी पुरुष इस बातको नहीं जानते कि मैं इस पृथ्वीपर ब्राह्मणोंके रूपमें निवास करता हूँ।। आक्रोशपरिवादाभ्यां ये रमन्ते द्विजातिषु। तान् मृतान् यमलोकस्थान् निपात्य पृथिवीतले।। आक्रम्योरसि पादेन क्रूरः संरक्तलोचनः। अग्निवर्णैस्तु संदंशैर्यमो जिह्वां समुद्धरेत्।। जो ब्राह्मणोंको गाली देकर और उनकी निन्दा करके प्रसन्न होते हैं, वे जब यमलोकमें जाते हैं तब लाल-लाल आँखोंवाले क्रूर यमराज उन्हें पृथ्वीपर पटककर छातीपर सवार हो जाते हैं और आगमें तपाये हुए सँड़सोंसे उनकी जीभ उखाड़ लेते हैं।। ये च विप्रान् निरीक्षन्ते पापाः पापेन चक्षुषा। अब्रह्मण्याः श्रुतेर्बाह्या नित्यं ब्रह्मद्विषो नराः।। तेषां घोरा महाकाया वक्रतुण्डा महाबलाः। उद्धरन्ति मुहूर्तेन खगाश्चक्षुर्यमाज्ञया।। जो पापी ब्राह्मणोंकी ओर पापपूर्ण दृष्टिसे देखते हैं, ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति नहीं करते, वैदिक मर्यादाका उल्लंघन करते हैं और सदा ब्राह्मणोंके द्वेषी बने रहते हैं, वे जब यमलोकमें पहुँचते हैं तब वहाँ यमराजकी आज्ञासे टेढ़ी चोंचवाले बड़े-बड़े बलवान् पक्षी आकर क्षणभरमें उन पापियोंकी आँखें निकाल लेते हैं।। यः प्रहारं द्विजेन्द्राय दद्यात् कुर्याच्च शोणितम्। अस्थिभङ्गं च यः कुर्यात् प्राणैर्वा विप्रयोजयेत्। सोऽऽनुपूर्व्येण यातीमान् नरकानेकविंशतिम्।।