भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2108, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2108

पूर्वाह्न हो या पराह्न, संध्याका समय हो या रात्रिका, आधी रात हो या सबेरा हो गया हो, वहाँकी यात्रा सदा खुली ही रहती है ।। मृत्युदूतैर्दुराधर्षैः प्रचण्डैश्चण्डशासनैः । आक्षिप्यमाणा ह्यवशाः प्रयान्ति यमसादनम् ।। उपर्युक्त सभी प्राणी दुर्धर्ष, उग्र शासन करनेवाले प्रचण्ड यमदूतोंके द्वारा विवश होकर मार खाते हुए यमलोक जाते हैं ।। क्वचिद् भीतैः क्वचिन्मत्तैः प्रस्खलद्भिः क्वचित् क्वचित् । क्रन्दद्भिर्वेदनातैंस्तु गन्तव्यं यमसादनम् ।। यमलोकके पथपर कहीं डरकर, कहीं पागल होकर, कहीं ठोकर खाकर और कहीं वेदनासे आर्त होकर रोते-चिल्लाते हुए चलना पड़ता है ।। निर्भर्त्स्यमानैरुद्विग्नैर्विधूतैर्भयविह्वलैः । तुद्यमानशरीरैश्च गन्तव्यं तर्जितैस्तथा ।। यमदूतोंकी डाँट सुनकर जीव उद्विग्न हो जाते हैं और भयसे विह्वल हो थर-थर काँपने लगते हैं। दूतोंकी मार खाकर शरीरमें बेतरह पीड़ा होती है तो भी उनकी फटकार सुनते हुए आगे बढ़ना पड़ता है ।। काष्ठोपलशिलाघातैर्दण्डोल्मुककशाङ्कुशैः । हन्यमानैर्यमपुरं गन्तव्यं धर्मवर्जितैः ।। धर्महीन पुरुषोंको काठ, पत्थर, शिला, डंडे, जलती लकड़ी, चाबुक और अंकुशकी मार खाते हुए यमपुरीको जाना पड़ता है ।। वेदनातैँश्च कूजद्भिर्विक्रोशद्भिंश्च विस्वरम् । वेदनातैः पतद्भिश्च गन्तव्यं जीवघातकैः ।। जो दूसरे जीवोंकी हत्या करते हैं, उन्हें इतनी पीड़ा दी जाती है कि वे आर्त होकर छटपटाने, कराहने तथा जोर-जोरसे चिल्लाने लगते हैं और उसी स्थितिमें उन्हें गिरते-पड़ते चलना पड़ता है ।। शक्तिभिर्भिन्दिपालैश्च शङ्कुतोमरसायकैः । तुद्यमानस्तु शूलाग्रैर्गन्तव्यं जीवघातकैः ।। चलते समय उनके ऊपर शक्ति, भिन्दिपाल, शंकु, तोमर, बाण और त्रिशूलकी मार पड़ती रहती है ।। श्वभिर्व्याघ्रैर्वृकैः काकैर्भक्ष्यमाणाः समन्ततः । तुद्यमानाश्च गच्छन्ति राक्षसैर्मांसघातिभिः ।। कुत्ते, बाघ, भेड़िये और कौवे उन्हें चारों ओरसे नोचते रहते हैं। मांस काटनेवाले राक्षस भी उन्हें पीड़ा पहुँचाते हैं ।। महिषैश्च मृगैश्चापि सूकरैः पृषतैस्तथा ।