महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्ष्यमाणैस्तदध्वानं गन्तव्यं मांसखादकैः ।। जो लोग मांस खाते हैं, उन्हें उस मार्गमें चलते समय भैंसे, मृग, सूअर और चितकबरे हरिन चोट पहुँचाते और उनके मांस काटकर खाया करते हैं ।। सूचीसुतीक्ष्णतुण्डाभिर्मक्षिकाभिः समन्ततः । तुद्यमानैश्च गन्तव्यं पापिष्ठैर्बालघातकैः ।। जो पापी बालकोंकी हत्या करते हैं, उन्हें चलते समय सूईके समान तीखे डंकवाली मक्खियाँ चारों ओरसे काटती रहती हैं ।। विस्रब्धं स्वामिनं मित्रं स्त्रियं वा घ्नन्ति ये नराः । शस्त्रैर्निर्भिद्यमानैश्च गन्तव्यं यमसादनम् ।। जो लोग अपने ऊपर विश्वास करनेवाले स्वामी, मित्र अथवा स्त्रीकी हत्या करते हैं, उन्हें यमपुरके मार्गपर चलते समय यमदूत हथियारोंसे छेदते रहते हैं ।। खादयन्ति च ये जीवान् दुःखमापादयन्ति ते । राक्षसैश्च श्वभिश्चैव भक्ष्यमाणा व्रजन्ति ते ।। जो दूसरे जीवोंको भक्षण करते या उन्हें दुःख पहुँचाते हैं, उनको चलते समय राक्षस और कुत्ते काट खाते हैं ।। ये हरन्ति च वस्त्राणि शय्याः प्रावरणानि च । ते यान्ति विद्रुता नग्नाः पिशाचा इव तत्पथम् ।। जो दूसरोंके कपड़े, पलंग और बिछौने चुराते हैं, वे उस मार्गमें पिशाचोंकी तरह नंगे होकर भागते हुए चलते हैं ।। गाश्च धान्यं हिरण्यं वा बलात् क्षेत्रं गृहं तथा । ये हरन्ति दुरात्मानः परस्वं पापकारिणः ।। पाषाणैरुलमुकैर्दण्डैः काष्ठघातैश्च झर्झरैः । हन्यमानैः क्षताकीर्णैर्गन्तव्यं तैर्यमालयम् ।। जो दुरात्मा और पापाचारी मनुष्य बलपूर्वक दूसरोंकी गौ, अनाज, सोना, खेत और गृह आदिको हड़प लेते हैं, वे यमलोकमें जाते समय यमदूतोंके हाथसे पत्थर, जलती हुई लकड़ी, डंडे, काठ और बेंतकी छड़ियोंकी मार खाते हैं तथा उनके समस्त अंगोंमें घाव हो जाता है ।। ब्रह्मस्वं ये हरन्तीह नरा नरकनिर्भयाः ।। आक्रोशन्तीह ये नित्यं प्रहरन्ति च ये द्विजान् ।। शुष्ककण्ठा निबद्धास्ते छिन्नजिह्वाक्षिनासिका । पूयशोणितदुर्गन्धा भक्ष्यमाणाश्च जम्बुकैः ।। चण्डालैर्भीषणैश्चण्डैस्तुद्यमानाः समन्ततः । क्रोशन्तः करुणं घोरं गच्छन्ति यमसादनम् ।।