भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2099, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2099

मनसा कर्मणा वाचा या गच्छेत् परपूरुषम् ।
योनिस्तस्या नरश्रेष्ठ गर्भाधानं न चार्हति ॥
इसी प्रकार जो कन्या पिता और माताकी दृष्टिसे उत्तम कुलमें उत्पन्न हो, जिसकी योनि दूषित न हुई हो तथा ब्राह्म आदि उत्तम विवाहोंकी विधिसे ब्याही गयी हो, वह उत्तम स्त्री मानी गयी है। उसीकी योनि श्रेष्ठ है। नरश्रेष्ठ! जो स्त्री मन, वाणी और क्रियासे परपुरुषके साथ समागम करती है, उसकी योनि गर्भाधानके योग्य नहीं होती ॥

दैवे पित्र्ये तथा दाने भोजने सहभाषणे ।
शयने सह सम्बन्धे न योग्या दुष्टयोनिजाः ॥
दूषित योनिसे उत्पन्न हुए मनुष्य यज्ञ, श्राद्ध, दान, भोजन, वार्तालाप, शयन तथा सम्बन्ध आदिमें सम्मिलित करने योग्य नहीं होते ॥

कानीनश्च सहोढश्च तथोभौ कुण्डगोलकौ ।
आरूढपतिताज्जातः पतितस्यापि यः सुतः ।
षडेते विप्रचाण्डाला निकृष्टाः श्वपचादपि ॥
बिना ब्याही कन्यासे उत्पन्न, ब्याहके समय गर्भवती कन्यासे उत्पन्न, पतिकी जीवितावस्थामें व्यभिचारसे उत्पन्न, पतिके मर जानेपर पर-पुरुषसे उत्पन्न, संन्यासीके वीर्यसे उत्पन्न तथा पतित मनुष्यसे उत्पन्न—ये छः प्रकारके चाण्डाल ब्राह्मण होते हैं, जो चाण्डालसे भी नीच हैं ॥

यो यत्र तत्र वा रेतः सिक्त्वा शूद्रासु वा चरेत् ।
कामचारी स पापात्मा बीजं तस्याशुभं भवेत् ॥
जो जहाँ-तहाँ जिस किसी स्त्रीसे अथवा शूद्र जातिकी स्त्रीसे भी समागम कर लेता है, वह पापात्मा स्वेच्छाचारी कहलाता है। उसका बीज अशुभ होता है ॥

अशुद्धं तद् भवेद् बीजं शुद्धां योनिं न चार्हति ।
दूषयत्यपि तां योनिं शुना लीढं हविर्यथा ॥
वह अशुद्ध वीर्य किसी शुद्ध योनिवाली स्त्रीके योग्य नहीं होता, उसके सम्पर्कसे कुत्तेके चाटे हुए हविष्यकी तरह शुद्ध योनि भी दूषित हो जाती है ॥

आत्मा हि शुक्रमुद्दिष्टं दैवतं परमं महत् ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन निरुन्ध्याच्छुक्रमात्मनः ॥
वीर्यको आत्मा बताया गया है। वह सबसे श्रेष्ठ देवता है। इसलिये सब प्रकारका प्रयत्न करके अपने वीर्यकी रक्षा करनी चाहिये ॥

आयुस्तेजो बलं वीर्यं प्रज्ञा श्रीश्च महद् यशः ।
पुण्यं च मत्प्रियत्वं च लभते ब्रह्मचर्यया ॥
मनुष्य ब्रह्मचर्यके पालनसे आयु, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, महान् यश, पुण्य और मेरे प्रेमको प्राप्त करता है ॥