भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2101, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2101

प्रजापति मनुका कहना है कि—'शील, स्वाध्याय, दान, शौच, कोमलता और सरलता—ये सद्गुण ब्राह्मणके लिये वेदसे भी बढ़कर हैं।।'
भूर्भुवः स्वरिति ब्रह्म यो वेदनिरतो द्विजः ।
स्वदारनिरतो दान्तः स विद्वान् स च भूसुरः ॥
जो ब्राह्मण ‘भूर्भुवः स्वः’ इन व्याहृतियोंके साथ गायत्रीका जप करता है, वेदके स्वाध्यायमें संलग्न रहता है और अपनी ही स्त्रीसे प्रेम करता है, वही जितेन्द्रिय, वही विद्वान् और वही इस भूमण्डलका देवता है ।।
संध्यामुपासते ये वै नित्यमेव द्विजोत्तमाः ।
ते यान्ति नरशार्दूल ब्रह्मलोकं न संशयः ॥
पुरुषसिंह! जो श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रतिदिन संध्योपासन करते हैं, वे निःसंदेह ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं ।।
सावित्रीमात्रसारोऽपि वरो विप्रः सुयन्त्रितः ।
नायन्त्रितश्चतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥
केवल गायत्रीमात्र जाननेवाला ब्राह्मण भी यदि नियमसे रहता है तो वह श्रेष्ठ है; किंतु जो चारों वेदोंका विद्वान् होनेपर भी सबका अन्न खाता है, सब कुछ बेचता है और नियमोंका पालन नहीं करता है, वह उत्तम नहीं माना जाता ।।
सावित्रीं चैव वेदांश्च तुलयातोलयन् पुरा ।
सदेवर्षिगणाश्चैव सर्वे ब्रह्मपुरःसराः ।
चतुर्णामपि वेदानां सा हि राजन् गरीयसी ॥
राजन्! पूर्वकालमें देवता और ऋषियोंने ब्रह्माजीके सामने गायत्री-मन्त्र और चारों वेदोंको तराजूपर रखकर तौला था। उस समय गायत्रीका पलड़ा ही चारों वेदोंसे भारी साबित हुआ ।।
यथा विकसिते पुष्पे मधु गृह्णन्ति षट्पदाः ।
एवं गृहीता सावित्री सर्ववेदे च पाण्डव ॥
पाण्डव! जैसे भ्रमर खिले हुए फूलोंसे उनके सारभूत मधुको ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण वेदोंसे उनके सारभूत गायत्रीका ग्रहण किया गया है ।।
तस्मात् तु सर्ववेदानां सावित्री प्राण उच्यते ।
निर्जीवा हीतरे वेदा विना सावित्रिया नृप ॥
इसलिये गायत्री सम्पूर्ण वेदोंका प्राण कहलाती है। नरेश्वर! गायत्रीके बिना सभी वेद निर्जीव हैं ।।
नायन्त्रितश्चतुर्वेदी शीलभ्रष्टः स कुत्सितः ।
शीलवृत्तसमायुक्तः सावित्रीपाठको वरः ॥