भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2102, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2102

नियम और सदाचारसे भ्रष्ट ब्राह्मण चारों वेदोंका विद्वान् हो तो भी वह निन्दाका ही पात्र है, किंतु शील और सदाचारसे युक्त ब्राह्मण यदि केवल गायत्रीका जप करता हो तो भी वह श्रेष्ठ माना जाता है ।। सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां शतावराम् । सावित्रीं जप कौन्तेय सर्वपापप्रणाशिनीम् ।। प्रतिदिन एक हजार गायत्री-मन्त्रका जप करना उत्तम है, सौ मन्त्रका जप करना मध्यम और दस मन्त्रका जप करना कनिष्ठ माना गया है। कुन्तीनन्दन! गायत्री सब पापोंको नष्ट करनेवाली है, इसलिये तुम सदा उसका जप करते रहो ।।

युधिष्ठिर उवाच त्रैलोक्यनाथ हे कृष्ण सर्वभूतात्मको ह्यसि । नानायोगपर श्रेष्ठ तुष्यसे केन कर्मणा ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**त्रिलोकीनाथ! आप सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं। विभिन्न योगोंके द्वारा प्राप्तव्य सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्ण! बताइये, किस कर्मसे आप संतुष्ट होते हैं? ।।

श्रीभगवानुवाच यदि भारसहस्रं तु गुग्गुल्वादि प्रधूपयेत् । करोति चेन्नमस्कारमुपहारं च कारयेत् ।। स्तौति यः स्तुतिभिर्मां च ऋग्यजुःसामभिः सदा । न तोषयति चेद् विप्रान् नाहं तुष्यामि भारत ।। **श्रीभगवान्ने कहा—**भारत! कोई एक हजार भार गुग्गुल आदि सुगन्धित पदार्थोंको जलाकर मुझे धूप दे, निरन्तर नमस्कार करे, खूब भेंट-पूजा चढ़ावे तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी स्तुतियोंसे सदा मेरा स्तवन करता रहे; किंतु यदि वह ब्राह्मणको संतुष्ट न कर सका तो मैं उसपर प्रसन्न नहीं होता ।। ब्राह्मणे पूजिते नित्यं पूजितोऽस्मि न संशयः । आक्रुष्टे चाहमाक्रुष्टो भवामि भरतर्षभ ।। भरतश्रेष्ठ! इसमें संदेह नहीं कि ब्राह्मणकी पूजासे सदा मेरी भी पूजा हो जाती है और ब्राह्मणको कटुवचन सुनानेसे मैं ही उस कटुवचनका लक्ष्य बनता हूँ ।। परा मयि गतिस्तेषां पूजयन्ति द्विजं हि ये । यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले ।। जो ब्राह्मणकी पूजा करते हैं, उनकी परमगति मुझमें ही होती है; क्योंकि पृथ्वीपर ब्राह्मणोंके रूपमें मैं ही निवास करता हूँ ।। यस्तान् पूजयति प्राज्ञो मद्गतेनान्तरात्मना । तमहं स्वेन रूपेण पश्यामि नरपुङ्गव ।।