महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2106, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंषडशीतिसहस्राणि योजनानां युधिष्ठिर ।
मानुषस्य च लोकस्य यमलोकस्य चान्तरम् ॥
युधिष्ठिर! मनुष्यलोक और यमलोकमें छियासी हजार योजनका अन्तर है ॥
न तत्र वृक्षच्छाया वा न तटाकं सरोऽपि वा ।
न वाप्यो दीर्घिका वापि न कूपो वा युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! इस बीचके मार्गमें न वृक्षकी छाया है, न तालाब है, न पोखरा है, न बावड़ी है और न कुआँ ही है ॥
न मण्डपं सभा वापि न प्रपा न निकेतनम् ।
न पर्वतो नदी वापि न भूमेर्विवरं क्वचित् ॥
न ग्रामो नाश्रमो वापि नोद्यानं वा वनानि च ।
न किंचिदाश्रयस्थानं पथि तस्मिन् युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! उस मार्गमें कहीं भी कोई मण्डप, बैठक, प्याऊ, घर, पर्वत, नदी, गुफा, गाँव, आश्रम, बगीचा, वन अथवा ठहरनेका दूसरा कोई स्थान भी नहीं है ॥
जन्तोर्हि प्राप्तकालस्य वेदनार्तस्य वै भृशम् ।
कारणैस्त्यक्तदेहस्य प्राणैः कण्ठगतैः पुनः ॥
शरीराच्चाल्यते जीवो ह्यवशो मातरिश्वना ।
निर्गतो वायुभूतस्तु षट्कोशात् तु कलेवरात् ॥
शरीरमन्यत् तद्रूपं तद्वर्णं तत्प्रमाणतः ।
अदृश्यं तत्प्रविष्टस्तु सोऽप्यदृष्टोऽथ केनचित् ॥
जब जीवका मृत्युकाल उपस्थित होता है और वह वेदनासे अत्यन्त छटपटाने लगता है, उस समय कारण-तत्त्व शरीरका त्याग कर देते हैं, प्राण कण्ठतक आ जाते हैं और वायुके वशमें पड़े हुए जीवको बरबस इस शरीरसे निकल जाना पड़ता है। छः कोशोंवाले शरीरसे निकलकर वायुरूपधारी जीव एक दूसरे अदृश्य शरीरमें प्रवेश करता है। उस शरीरके रूप, रंग और माप भी पहले शरीरके ही समान होते हैं। उसमें प्रविष्ट होनेपर जीवको कोई देख नहीं पाता ॥
सोऽन्तरात्मा देहवतामष्टाङ्गो यस्तु संचरेत् ।
छेदनाद् भेदनाद् दाहात् ताडनाद् वा न नश्यति ॥
देहधारियोंका अन्तरात्मा जीव आठ अंगोंसे युक्त होकर यमलोककी यात्रा करता है। वह शरीर काटने, टुकड़े-टुकड़े करने, जलाने अथवा मारनेसे नष्ट नहीं होता ॥
नानारूपधरैर्घोरैः प्रचण्डैश्चण्डसाधनैः ।
नीयमानो दुराधर्षैर्यमदूतैर्यमाज्ञया ॥
यमराजकी आज्ञासे नाना प्रकारके भयंकर रूपधारी अत्यन्त क्रोधी और दुर्धर्ष यमदूत प्रचण्ड हथियार लिये आते हैं और जीवको जबरदस्ती पकड़कर ले जाते हैं ॥