भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2157, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2157

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[कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद]

वैशम्पायन उवाच

दानपुण्यफलं श्रुत्वा तपःपुण्यफलानि च ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! दान और तपस्याके पुण्य-फलको सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा— ॥
या चैषा कपिला देव पूर्वमुत्पादिता विभो ।
होमधेनुः सदा पुण्या चतुर्वक्त्रेण माधव ॥
सा कथं ब्राह्मणेभ्यो हि देया कस्मिन् दिनेऽपि वा ।
कीदृशाय च विप्राय दातव्या पुण्यलक्षणा ॥
'भगवन्! विभो! जिसे ब्रह्माजीने अग्निहोत्रकी सिद्धिके लिये पूर्वकालमें उत्पन्न किया था तथा जो सदा ही पवित्र मानी गयी है, उस कपिला गौका ब्राह्मणोंको किस प्रकार दान करना चाहिये? माधव! वह पवित्र लक्षणोंवाली गौ किस दिन और कैसे ब्राह्मणको देनी चाहिये? ॥
कति वा कपिला प्रोक्ता स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
कैर्वा देयाश्च ता देव श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
'ब्रह्माजीने कपिला गौके कितने भेद बतलाये हैं तथा कपिला गौका दान करनेवाला मनुष्य कैसा होना चाहिये? इन सब बातोंको मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ' ॥
एवमुक्तो हृषीकेशो धर्मपुत्रेण संसदि ।
अब्रवीत् कपिलासंख्यां तासां माहात्म्यमेव च ॥
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके द्वारा सभामें इस प्रकार कहे जानेपर श्रीकृष्ण कपिला गौकी संख्या और उनकी महिमाका वर्णन करने लगे— ॥
शृणु पाण्डव तत्त्वेन पवित्रं पावनं परम् ।
यच्छ्रुत्वा पापकर्मापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥
'पाण्डुनन्दन! यह विषय बड़ा ही पवित्र और पावन है। इसका श्रवण करनेसे पापी पुरुष भी पापसे मुक्त हो जाता है, अतः ध्यान देकर सुनो ॥
कपिला ह्यग्निहोत्रार्थे विप्रार्थे वा स्वयम्भुवा ।
सर्वं तेजाः समुद्धृत्य निर्मिता ब्रह्मणा पुरा ॥
'पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने अग्निहोत्र तथा ब्राह्मणोंके लिये सम्पूर्ण तेजोंका संग्रह करके कपिला गौको उत्पन्न किया था ॥
पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
पुण्यानां परमं पुण्यं कपिला पाण्डुनन्दन ॥