महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2194, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनारायण पुराणेश लोकावास नमोऽस्तु ते ।
श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन धर्मसारसमुच्चयम् ॥
युधिष्ठिरने कहा— भगवान्! आप साक्षात् नारायण, पुरातन ईश्वर और सम्पूर्ण जगत्के निवासस्थान हैं। आपको नमस्कार है। अब मैं सम्पूर्ण धर्मोंका सार पूर्णतया श्रवण करना चाहता हूँ ॥
श्रीभगवानुवाच
धर्मसारं महाप्राज्ञ मनुना प्रोक्तमादितः ।
प्रवक्ष्यामि मनुप्रोक्तं पौराणं श्रुतिसंहितम् ॥
श्रीभगवान् बोले— महाप्राज्ञ! मनुजीने सृष्टिके आदिकालमें जो धर्मके सार-तत्त्वका वर्णन किया है, वह पुराणोंके अनुकूल और वेदके द्वारा समर्थित है। उसी मनुप्रोक्त धर्मका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
अग्निचित्कपिला सत्री राजा भिक्षुर्महोदधिः ।
दृष्टमात्रात् पुनन्त्येते तस्मात् पश्येत तान् सदा ॥
अग्निहोत्री द्विज, कपिला गौ, यज्ञ करनेवाला पुरुष, राजा, संन्यासी और महासागर—ये दर्शनमात्रसे मनुष्यको पवित्र कर देते हैं, इसलिये सदा इनका दर्शन करना चाहिये ॥
बहुनां न प्रदातव्या गौर्वस्त्रं शयनं स्त्रियः ।
तादृग्भूतं तु तद् दानं दातारं नोपतिष्ठति ॥
एक गौ, एक वस्त्र, एक शय्या और एक स्त्रीको कभी अनेक मनुष्योंके अधिकारमें नहीं देना चाहिये; क्योंकि वैसा करनेपर उस दानका फल दाताको नहीं मिलता ॥
मा ददात्विति यो ब्रूयाद् ब्राह्मणेषु च गोषु च ।
तिर्यग्योनिशतं गत्वा चण्डालेषूपजायते ॥
जो ब्राह्मणको और गौको आहार देते समय 'मत दो' कहकर मना करता है, वह सौ बार पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेकर अन्तमें चाण्डाल होता है ॥
ब्राह्मणस्वं च यद् दैवं दरिद्रस्यैव यद् धनम् ।
गुरोश्चापि हृतं राजन् स्वर्गस्थानपि पातयेत् ॥
राजन्! ब्राह्मणका, देवताका, दरिद्रका और गुरुका धन यदि चुरा लिया जाय तो वह स्वर्गवासियोंको भी नीचे गिरा देता है ॥
धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ।
द्वितीयं धर्मशास्त्राणि तृतीयं लोकसंग्रहः ॥
जो धर्मका तत्त्व जानना चाहते हैं, उनके लिये वेद मुख्य प्रमाण हैं, धर्मशास्त्र दूसरा प्रमाण है और लोकाचार तीसरा प्रमाण है ॥
आसमुद्राच्च यत् पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात् ।