महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2193, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपितरोंके लिये तिलमिश्रित जलका भी दान कर दे तो उसके द्वारा एक हजार वर्षतक श्राद्ध किया हुआ हो जाता है। यह रहस्य स्वयं पितरोंका बतलाया हुआ है।। यस्त्वेकपङ्क्त्यां विषमं ददाति स्नेहाद् भयाद् वा यदि वार्थहेतोः। क्रूरं दुराचारमनात्मवन्तं ब्रह्मघ्नमेनं कवयो वदन्ति ॥ जो मनुष्य स्नेह या भयके कारण अथवा धन पानेकी इच्छासे एक पंक्तिमें बैठे हुए लोगोंको भोजन परोसनेमें भेद करता है, उसे विद्वान् पुरुष क्रूर, दुराचारी, अजितात्मा और ब्रह्महत्यारा बतलाते हैं।। धनानि येषां विपुलानि सन्ति नित्यं रमन्ते परलोकमूढाः। तेषामयं शत्रुवरघ्न लोको नान्यत् सुखं देहसुखे रतानाम् ॥ शत्रुसूदन! जिनके पास धनका भण्डार भरा हुआ है और जो परलोकके विषयमें कुछ भी न जाननेके कारण सदा भोग-विलासमें ही रम रहे हैं, वे केवल दैहिक सुखमें ही आसक्त हैं। अतः उनके लिये इस लोकका ही सुख सुलभ है; पारलौकिक सुख तो उन्हें कभी नहीं मिलता।। ये चैव मुक्तास्तपसि प्रयुक्ताः स्वाध्यायशीला जरयन्ति देहम्। जितेन्द्रिया भूतहिते निविष्टा- स्तेषामसौ चापि परश्च लोकः ॥ जो विषयोंकी आसक्तिसे मुक्त होकर तपस्यामें संलग्न रहते हों, जिन्होंने नित्य स्वाध्याय करते हुए अपने शरीरको दुर्बल कर दिया हो, जो इन्द्रियोंको वशमें रखते हों और समस्त प्राणियोंके हित-साधनमें लगे रहते हों, उनके लिये इस लोकका भी सुख सुलभ है और परलोकका भी।। ये चैव विद्यां न तपो न दानं न चापि मूढाः प्रजने यतन्ते। न चापि गच्छन्ति सुखानि भोगां- स्तेषामयं चापि परश्च नास्ति ॥ परंतु जो मूर्ख न विद्या पढ़ते हैं, न तप करते हैं, न दान देते हैं, न शास्त्रानुसार संतानोत्पादनका प्रयत्न करते हैं और न अन्य सुख-भोगोंका ही अनुभव कर पाते हैं, उनके लिये न इस लोकमें सुख है न परलोकमें।।
युधिष्ठिर उवाच