महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2192, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिवृत्तिमार्गपरायण ब्राह्मणको शूद्रके घरमें दूध या दही भी नहीं खाना चाहिये। उसे भी शूद्रान्न ही समझना चाहिये ।।
विप्राणां भोक्तुकामानामत्यन्तं चान्नकाङ्क्षिणाम् ।
यो विघ्नं कुरुते मर्त्यस्ततो नान्योऽस्ति पापकृत् ॥
अत्यन्त भूखे होनेके कारण अन्नकी इच्छावाले ब्राह्मणोंके भोजनमें जो मनुष्य विघ्न डालता है, उससे बढ़कर पापी दूसरा कोई नहीं है ।।
सर्वे च वेदाः सह षड्भिरङ्गैः
सांख्यं पुराणं च कुले च जन्म ।
नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति
शीलव्यपेतस्य नृप द्विजस्य ॥
राजन्! यदि ब्राह्मण शील एवं सदाचारसे रहित हो जाय तो छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेद, सांख्य, पुराण और उत्तम कुलका जन्म—ये सब मिलकर भी उसे सद्गति नहीं दे सकते ।।
ग्रहोपरागे विषुवेऽयनान्ते
पित्र्ये मघासु स्वसुते च जाते ।
गयेषु पिण्डेषु च पाण्डुपुत्र
दत्तं भवेन्निष्क्सहस्रतुल्यम् ॥
पाण्डुनन्दन! ग्रहणके समय, विषुवयोगमें, अयन समाप्त होनेपर, पितृकर्म (श्राद्ध आदि)-में, मघा-नक्षत्रमें, अपने यहाँ पुत्रका जन्म होनेपर तथा गयामें पिण्डदान करते समय जो दान दिया जाता है, वह एक हजार स्वर्णमुद्राके दान देनेके समान होता है ।।
वैशाखमासस्य तु या तृतीया-
नवद्यासौ कार्तिकशुक्लपक्षे ।
नभस्यमासस्य च कृष्णपक्षे
त्रयोदशी पञ्चदशी च माघे ॥
उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च
श्राद्धस्य कालो ह्ययनद्वये च ।
पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं
दद्यात् पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः ।
श्राद्धं कृतं तेन समा सहस्रं
रहस्यमेतत् पितरो वदन्ति ॥
वैशाखमासकी शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्लपक्षकी तृतीया, भाद्रपद मासकी कृष्णा त्रयोदशी, माघकी अमावास्या, चन्द्रमा और सूर्यका ग्रहण तथा उत्तरायण और दक्षिणायनके प्रारम्भिक दिन—ये श्राद्धके उत्तम काल हैं। इन दिनोंमें मनुष्य पवित्रचित्त होकर यदि