महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअहं चापि न जानामि गतिं तस्य नराधिप ।।
शूद्रान्नपुष्टाङ्गोऽप्यधीयानो हि नित्यशः ।
जपतो जुह्वतो वापि गतिरूर्ध्वं न विद्यते ।।
नरेश्वर! जिसका शरीर मरणाशौचका अन्न खाकर मोटा हुआ हो, जो शूद्रका अन्न भोजन करता हो और शूद्रके ही अन्नके रससे पुष्ट हुआ हो, उस ब्राह्मणकी किस प्रकार गति होती है, मैं नहीं जानता; क्योंकि प्रतिदिन स्वाध्याय, जप और होम करनेपर भी उसकी उत्तम गति नहीं होती ।।
आहिताग्निश्च यो विप्रः शूद्रान्नान्न निवर्तते ।
पञ्च तस्य प्रणश्यन्ति आत्मा ब्रह्म त्रयोऽग्नयः ।।
जो ब्राह्मण प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेपर भी शूद्रके अन्नसे बचा न रहता हो, उसके आत्मा, वेदाध्ययन और तीनों अग्नि—इन पाँचोंका नाश हो जाता है ।।
शूद्रप्रेषणकर्तुश्च ब्राह्मणस्य विशेषतः ।
भूमावन्नं प्रदातव्यं श्वशृगालसमो हि सः ।।
शूद्रकी सेवा करनेवाले ब्राह्मणको खानेके लिये विशेषतः जमीनपर ही अन्न डाल देना चाहिये; क्योंकि वह कुत्ते और गीदड़के ही समान होता है ।।
प्रेतभूतं तु यः शूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
अनुगच्छेन्नीयमानं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।।
जो ब्राह्मण मूर्खतावश मरे हुए शूद्रके शवके पीछे-पीछे श्मशानभूमिमें जाता है, उसको तीन रातका अशौच लगता है ।।
त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे नदीं गत्वा समुद्रगाम् ।
प्राणायामशतं कृत्वा घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति ।।
तीन रात पूर्ण होनेपर किसी समुद्रमें मिलनेवाली नदीके भीतर स्नान करके सौ बार प्राणायाम करे और घी पीवे तो वह शुद्ध होता है ।।
अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजोत्तमाः ।
पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं ते प्राप्नुवन्ति हि ।।
जो श्रेष्ठ द्विज किसी अनाथ ब्राह्मणके शवको श्मशानमें ले जाते हैं, उन्हें पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है ।।
न तेषामशुभं किंचित् पापं वा शुभकर्मणाम् ।
जलावगाहनादेव सद्यः शौचं विधीयते ।।
उन शुभ कर्म करनेवालोंको किसी प्रकारका अशुभ या पाप नहीं लगता। वे जलमें स्नान करनेमात्रसे तत्काल शुद्ध हो जाते हैं ।।
शूद्रवेश्मनि विप्रेण क्षीरं वा यदि वा दधि ।
निवृत्तेन न भोक्तव्यं विद्धि शूद्रान्नमेव तत् ।।