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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2190, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2190

परदेशमें रहनेवाला पुरुष यदि कुछ कालके लिये घर आवे तो वह ऋतुकालमें तथा उससे भिन्न समयमें भी, रातमें या दिनमें भी अपनी स्त्रीके साथ समागम करनेपर प्रायश्चित्तका भागी नहीं होता ।।

युधिष्ठिर उवाच

प्रशस्याः कीदृशा विप्रा निन्द्याश्चापि सुरेश्वर ।
अष्टकायाश्च कः कालस्तन्मे कथय सुव्रत ।।
युधिष्ठिरने पूछा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले देवेश्वर! कैसे ब्राह्मण प्रशंसाके योग्य होते हैं और कैसे निन्दाके योग्य? तथा अष्टका-श्राद्धका कौन-सा समय है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीभगवानुवाच

कुलीनः कर्मकृद् वैद्यस्तथा चाप्यानृशंस्यवान् ।
श्रीमानृजुः सत्यवादी पात्राः सर्व इमे द्विजाः ।।
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! उत्तम कुलमें उत्पन्न, शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले, विद्वान्, दयालु, श्रीसम्पन्न, सरल और सत्यवादी—ये सभी ब्राह्मण सुपात्र (प्रशंसाके योग्य) माने जाते हैं ।।

एते चाग्रासनस्थास्ते भुञ्जानाः प्रथमं द्विजाः ।
तस्यां पङ्क्तयां तु ये चान्ये तान् पुनन्त्येव दर्शनात् ।।
ये आगेके आसनपर बैठकर सबसे पहले भोजन करनेके अधिकारी हैं तथा उस पंक्तिमें जितने लोग बैठे होते हैं, उन सबको ये अपने दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं ।।

मद्भक्ता ये द्विजश्रेष्ठा मद्गता मत्परायणाः ।
तान् पङ्क्तिपावनान् विद्धि पूज्यांश्चैव विशेषतः ।।
जो श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझमें मन लगानेवाले और मेरे शरणागत भक्त हों, उन्हें पङ्क्तिपावन समझो। वे विशेषरूपसे पूजा करनेके योग्य हैं ।।

निन्द्यान् शृणु द्विजान् राजन्नपि वा वेदपारगान् ।।
ब्राह्मणच्छद्मना लोके चरतः पापकारिणः ।
राजन्! अब निन्दाके योग्य ब्राह्मणोंका वर्णन सुनो। जो ब्राह्मण संसारमें कपटपूर्ण बर्ताव करते हैं, वे वेदोंके पारगामी विद्वान् होनेपर भी पापाचारी ही माने जाते हैं ।।

अनग्निरनधीयानः प्रतिग्रहरुचिस्तु यः ।।
यतस्ततस्तु भुञ्जानस्तं विद्याद् ब्रह्मदूषकम् ।
जो अग्निहोत्र और स्वाध्याय न करता हो, सदा दान लेनेकी ही रुचि रखता हो और जहाँ-कहीं भी भोजन कर लेता हो, उसको ब्राह्मणजातिका कलंक समझना चाहिये ।।

मृतसूतकपुष्टाङ्गो यश्च शूद्रान्नभुग् द्विजः ।