भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2189, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2189

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[आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन]

युधिष्ठिर उवाच

समुच्चयं च धर्माणां भोज्याभोज्यं तथैव च ।
श्रुतं मया त्वत्प्रसादादापद्धर्मं वदस्व मे ।।
युधिष्ठिरने कहा— भगवन्! आपकी कृपासे मैंने सब धर्मोंके संग्रहका एवं भोजनके योग्य और भोजनके अयोग्य अन्नका विषय भी सुन लिया। अब कृपा करके आपद्धर्मका वर्णन कीजिये ।।

श्रीभगवानुवाच

दुर्भिक्षे राष्ट्रसम्बाधेऽप्याशौचे मृतसूतके ।
धर्मकालेऽध्वनि तथा नियमो येन लुप्यते ।।
दूराध्वगमनात् खिन्नो द्विजालाभेऽथ शूद्रतः ।
अकृतान्नं तु यत् किंचिद् गृह्णीयादात्मवृत्तये ।।
श्रीभगवान् बोले— राजन्! जब देशमें अकाल पड़ा हो, राष्ट्रके ऊपर कोई आपत्ति आयी हो, जन्म या मृत्युका सूतक हो तथा कड़ी धूपमें रास्ता चलना पड़ा हो और इन सब कारणोंसे नियमका निर्वाह न हो सके तथा दूरका मार्ग तै करनेके कारण विशेष थकावट आ गयी हो, उस अवस्थामें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके न मिलनेपर शूद्रसे भी जीवन-निर्वाहके लिये थोड़ा-सा कच्चा अन्न लिया जा सकता है ।।

आतुरो दुःखितो वापि तथार्तो वा बुभुक्षितः ।
भुञ्जन्नविधिना विप्रः प्रायश्चित्तायते न च ।।
रोगी, दुखी, पीड़ित और भूखा ब्राह्मण यदि विधि-विधानके बिना भोजन कर ले तो भी उसे प्रायश्चित्त नहीं लगता ।।

अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूलं घृतं पयः ।
हविर्ब्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम् ।।
जल, मूल, घी, दूध, हवि, ब्राह्मणकी इच्छा पूर्ण करना, गुरुकी आज्ञाका पालन और ओषधि—इन आठोंके सेवनसे व्रतका भंग नहीं होता ।।

अशक्तो विधिवत् कर्तुं प्रायश्चित्तानि यो नरः ।
विदुषां वचनेनापि दानेनापि विशुद्ध्यति ।।
जो मनुष्य विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करनेमें असमर्थ हो, वह विद्वानोंके वचनसे तथा दानके द्वारा भी शुद्ध हो सकता है ।।

अनृतावृतुकाले वा दिवा रात्रौ तथापि वा ।
प्रोषितस्तु स्त्रियं गच्छेत् प्रायश्चित्तीयते न च ।।