महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2188, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्य नश्यति तत् सर्वं दुःस्वप्नं च विनश्यति ।।
उस पुरुषने जान-बूझकर या अनजानमें जो-जो पाप किये होते हैं, वह सब नष्ट हो जाते हैं तथा उसको कभी बुरे स्वप्न नहीं दिखायी देते ।।
तिलाः पवित्राः पापघ्ना नारायणसमुद्भवाः ।
तिलान् श्राद्धे प्रशंसन्ति दानं चेदमनुत्तमम् ।।
तिल बड़े पवित्र और पापनाशक होते हैं, भगवान् नारायणसे उनकी उत्पत्ति हुई है। इसलिये श्राद्धमें तिलकी बड़ी प्रशंसा की गयी है और तिलका दान अत्यन्त उत्तम दान बताया गया है ।।
तिलान् दद्यात् तिलान् भक्ष्यात् तिलान् प्रातरुपस्पृशेत् ।
तिलं तिलमिति ब्रूयात् तिलाः पापहरा हि ते ।।
तिल दान करे, तिल भक्षण करे और सबेरे तिलका उबटन लगाकर स्नान करे तथा सदा ही अपने मुँहसे ‘तिल-तिल’ का उच्चारण किया करे; क्योंकि तिल सब पापोंको नष्ट करनेवाले होते हैं ।।
तिलान् न पीडयेद् विप्रो यन्त्रचक्रे स्वयं नृप ।
पीडयन् हि द्विजो मोहान्नरकं याति रौरवम् ।।
राजन्! ब्राह्मणको स्वयं तिल पेरनेकी मशीनमें तिल डालकर तेल नहीं पेरना चाहिये। जो मोहवश स्वयं ही तिल पेरता है, वह रौरव नरकमें पड़ता है ।।
इक्षुवंशोद्भवः सोमः सोमवंशोद्भवा द्विजाः ।
तस्मान्न पीडयेदिक्षुं यन्त्रचक्रे द्विजोत्तमः ।।
युधिष्ठिर! चन्द्रमा इक्षु (गन्ने)-के वंशमें उत्पन्न हुआ है और ब्राह्मण चन्द्रमाके वंशमें उत्पन्न हुए हैं। इसलिये ब्राह्मणको कोल्हूमें गन्ना नहीं पेरना चाहिये ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)