भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2187, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2187

यदि आचमन किये बिना ही भोजन करनेवाला द्विज भोजनके आसनसे उठ जाय तो उसे तुरंत स्नान करना चाहिये, अन्यथा वह अपवित्र ही रहता है।।

युधिष्ठिर उवाच

तृणमुष्टिविधानं च तिलमाहात्म्यमेव च ।
इक्षोः सोमसमुद्भूतिं वक्तुमर्हसि मानद ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! गौओंके आगे घासकी मुट्ठी डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य क्या है तथा गन्नेसे चन्द्रमाकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है—यह बतानेकी कृपा कीजिये।।

श्रीभगवानुवाच

पितरो वृषभा ज्ञेया गावो लोकस्य मातरः ।
तासां तु पूजया राजन् पूजिताः पितृदेवताः ॥
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! बैलोंको जगत्‌का पिता समझना चाहिये और गौएँ संसारकी माताएँ हैं, उनकी पूजा करनेसे सम्पूर्ण पितरों और देवताओंकी पूजा हो जाती है।।

सभा प्रपा गृहाश्चापि देवतायतनानि च ।
शुद्ध्यन्ति शकृता यासां किं भूतमधिकं ततः ॥
जिनके गोबरसे लीपनेपर सभा-भवन, पौंसले, घर और देवमन्दिर भी शुद्ध हो जाते हैं, उन गौओंसे बढ़कर और कौन प्राणी हो सकता है? ।।

ग्रासमुष्टिं परगवे दद्यात् संवत्सरं तु यः ।
अकृत्वा स्वयमाहारं प्राप्तस्तत् सार्वकालिकम् ॥
जो मनुष्य एक सालतक स्वयं भोजन करनेके पहले प्रतिदिन दूसरेकी गायको मुट्ठीभर घास खिलाया करता है, उसको प्रत्येक समय गौकी सेवा करनेका फल प्राप्त होता है ।।

गावो मे मातरः सर्वाः पितरश्चैव गोवृषाः ।
ग्रासमुष्टिं मया दत्तं प्रतिगृह्णीत मातरः ॥
गोमाताके सामने घास रखकर इस प्रकार कहना चाहिये—'संसारकी समस्त गौएँ मेरी माताएँ और सम्पूर्ण वृषभ मेरे पिता हैं। गोमाताओ! मैंने तुम्हारी सेवामें यह घासकी मुट्ठी अर्पण की है, इसे स्वीकार करो' ।।

इत्युक्त्वानेन मन्त्रेण गायत्र्या वा समाहितः ।
अभिमन्त्र्य ग्रासमुष्टिं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
यह मन्त्र पढ़कर अथवा गायत्रीका उच्चारण करके एकाग्रचित्तसे घासको अभिमन्त्रित करके गौको खिला दे। ऐसा करनेसे जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होती है, उसे सुनो ।।

यत् कृतं दुष्कृतं तेन ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा ।