भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2186, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2186

जो पापी स्त्रीके भोजन किये हुए पात्रमें भोजन करता है, स्त्रीका जूठा खाता है तथा स्त्रीके साथ एक बर्तनमें भोजन करता है, वह मानो मदिरा पान करता है। तत्त्वदर्शी मुनियोंने उस पापसे छूटनेका कोई प्रायश्चित्त ही नहीं देखा है ।।

पिबतः पतिते तोये भोजने मखनिस्सृते ।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।
यदि पानी पीते-पीते उसकी बूँद मुँहसे निकलकर भोजनमें गिर पड़े तो वह खानेयोग्य नहीं रह जाता। जो उसे खा लेता है, उस पुरुषको चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।

पीतशेषं तु तन्नाम न पेयं पाण्डुनन्दन ।
पिबेद् यदि हि तन्मोहाद् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।।
पाण्डुनन्दन! इसी प्रकार पीनेसे बचा हुआ पानी भी पुनः पीनेके योग्य नहीं रहता। यदि कोई ब्राह्मण मोहवश उसको पी ले तो उसे चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।

मौनी वाप्यथवा भूमौ नावलोक्य दिशस्तथा ।
भुञ्जीत विधिवद् विप्रो न चोच्छिष्टं प्रदापयेत् ।।
ब्राह्मणको उचित है कि वह मौन होकर पृथ्वी या दिशाओंकी ओर न देखते हुए विधिवत् भोजन करे, किसीको अपना जूठा न दे ।।

सदा चात्यशनं नाद्यान्नातिहीनं च कर्हिचित् ।
यथान्नेन व्यथा न स्यात् तथा भुञ्जीत नित्यशः ।।
कभी भी न तो बहुत अधिक और न कम ही भोजन करे। प्रतिदिन उतना ही अन्न खाय, जिससे अपनेको कष्ट न हो ।।

केशकीटोपपन्नं च मुखमारुतवीजितम् ।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।
जिस भोजनमें बाल या कोई कीड़ा पड़ा हो, जिसे मुँहसे फूँककर ठंडा किया गया हो, उसको अखाद्य समझना चाहिये। ऐसे अन्नको भोजन कर लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।

उत्थाय च पुनः स्पृष्टं पादस्पृष्टं च लङ्घितम् ।
अन्नं तद् राक्षसं विद्यात् तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ।।
भोजनके स्थानसे उठ जानेके बाद जिसे फिर छू दिया गया हो, जो पैरसे छू गया या लाँघ दिया गया हो, वह राक्षसके खानेयोग्य अन्न है; ऐसा समझकर उसका त्याग कर देना चाहिये ।।

यद्युत्तिष्ठत्यनाचान्तो भुक्तवानासनात् ततः ।
स्नानं सद्यः प्रकुर्वीत सोऽन्यथाप्रयतो भवेत् ।।