महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिस अन्नकी निन्दा की जाती है, उसे राक्षस खाते हैं! भोजन आरम्भ करनेसे पहले हाथमें जल लेकर उसके द्वारा अन्नकी प्रदक्षिणा करे ।।
पञ्च प्राणाहुतीः कुर्यात् समन्त्रं तु पृथक् पृथक् ।।
फिर मन्त्र पढ़कर पृथक्-पृथक् पाँचों प्राणोंको अन्नकी आहुति दे ।।
यथा रसं न जानाति जिह्वा प्राणाहुतौ नृप ।
तथा समाहितः कुर्यात् प्राणाहुतिमतन्द्रितः ।।
राजन्! प्राणोंको आहुति देते समय स्थिरचित्त और सावधान होकर इस प्रकार प्राणोंको आहुति दे जिससे जिह्वाको रसका ज्ञान न हो ।।
विदित्वाऽन्नमथान्नादं पञ्च प्राणांश्च पाण्डव ।
यः कुर्यादाहुतीः पञ्च तेनेष्टाः पञ्च वायवः ।।
पाण्डुनन्दन! अन्न, अन्नाद और पाँचों प्राणोंके तत्त्वको जानकर जो प्राणाग्निहोत्र करता है, उसके द्वारा पञ्चवायुओंका यजन हो जाता है ।।
अतोऽन्यथा तु भुञ्जानो ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
तेनान्नेनासुरान् प्रेतान् राक्षसांस्तर्पयिष्यति ।।
इसके विपरीत भोजन करनेवाला मूर्ख ब्राह्मण अन्नके द्वारा असुर, प्रेत और राक्षसोंको ही तृप्त करता है ।।
वक्त्रप्रमाणान् पिण्डांश्च ग्रसेदेकैकशः पुनः ।
वक्त्राधिकं तु यत् पिण्डमात्मोच्छिष्टं तदुच्यते ।।
प्राणोंको आहुति देनेके पश्चात् अपने मुखमें पड़ने लायक एक-एक ग्रास अन्न उठाकर भोजन करे। जो ग्रास अपने मुखमें जानेकी अपेक्षा बड़ा होनेके कारण एक बारमें न खाया जा सके, उसमेंसे बचा हुआ ग्रास अपना उच्छिष्ट कहा जाता है ।।
पिण्डावशिष्टमन्यच्च वक्त्रान्निस्सृतमेव च ।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।
ग्राससे बचे हुए तथा मुँहसे निकले हुए अन्नको अखाद्य समझे और उसे खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करे ।।
स्वमुच्छिष्टं तु यो भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते मुक्तभोजनम् ।।
चान्द्रायणं चरेत् कृच्छ्रं प्राजापत्यमथापि वा ।
जो अपना जूठा खाता है तथा एक बार खाकर छोड़े हुए भोजनको फिर ग्रहण करता है, उसको चान्द्रायण, कृच्छ्र अथवा प्राजापत्य-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।
स्त्रीपात्रभुङ्नरः पापः स्त्रीणामुच्छिष्टभुक्तथा ।
तया सह च यो भुङ्क्ते स भुङ्क्ते मद्यमेव हि ।
न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।।