महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
निवृत्तिमार्गपरायण ब्राह्मणको शूद्रके घरमें दूध या दही भी नहीं खाना चाहिये। उसे भी शूद्रान्न ही समझना चाहिये ।।
विप्राणां भोक्तुकामानामत्यन्तं चान्नकाङ्क्षिणाम् ।
यो विघ्नं कुरुते मर्त्यस्ततो नान्योऽस्ति पापकृत् ॥
अत्यन्त भूखे होनेके कारण अन्नकी इच्छावाले ब्राह्मणोंके भोजनमें जो मनुष्य विघ्न डालता है, उससे बढ़कर पापी दूसरा कोई नहीं है ।।
सर्वे च वेदाः सह षड्भिरङ्गैः
सांख्यं पुराणं च कुले च जन्म ।
नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति
शीलव्यपेतस्य नृप द्विजस्य ॥
राजन्! यदि ब्राह्मण शील एवं सदाचारसे रहित हो जाय तो छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेद, सांख्य, पुराण और उत्तम कुलका जन्म—ये सब मिलकर भी उसे सद्गति नहीं दे सकते ।।
ग्रहोपरागे विषुवेऽयनान्ते
पित्र्ये मघासु स्वसुते च जाते ।
गयेषु पिण्डेषु च पाण्डुपुत्र
दत्तं भवेन्निष्क्सहस्रतुल्यम् ॥
पाण्डुनन्दन! ग्रहणके समय, विषुवयोगमें, अयन समाप्त होनेपर, पितृकर्म (श्राद्ध आदि)-में, मघा-नक्षत्रमें, अपने यहाँ पुत्रका जन्म होनेपर तथा गयामें पिण्डदान करते समय जो दान दिया जाता है, वह एक हजार स्वर्णमुद्राके दान देनेके समान होता है ।।
वैशाखमासस्य तु या तृतीया-
नवद्यासौ कार्तिकशुक्लपक्षे ।
नभस्यमासस्य च कृष्णपक्षे
त्रयोदशी पञ्चदशी च माघे ॥
उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च
श्राद्धस्य कालो ह्ययनद्वये च ।
पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं
दद्यात् पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः ।
श्राद्धं कृतं तेन समा सहस्रं
रहस्यमेतत् पितरो वदन्ति ॥
वैशाखमासकी शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्लपक्षकी तृतीया, भाद्रपद मासकी कृष्णा त्रयोदशी, माघकी अमावास्या, चन्द्रमा और सूर्यका ग्रहण तथा उत्तरायण और दक्षिणायनके प्रारम्भिक दिन—ये श्राद्धके उत्तम काल हैं। इन दिनोंमें मनुष्य पवित्रचित्त होकर यदि
पितरोंके लिये तिलमिश्रित जलका भी दान कर दे तो उसके द्वारा एक हजार वर्षतक श्राद्ध किया हुआ हो जाता है। यह रहस्य स्वयं पितरोंका बतलाया हुआ है।। यस्त्वेकपङ्क्त्यां विषमं ददाति स्नेहाद् भयाद् वा यदि वार्थहेतोः। क्रूरं दुराचारमनात्मवन्तं ब्रह्मघ्नमेनं कवयो वदन्ति ॥ जो मनुष्य स्नेह या भयके कारण अथवा धन पानेकी इच्छासे एक पंक्तिमें बैठे हुए लोगोंको भोजन परोसनेमें भेद करता है, उसे विद्वान् पुरुष क्रूर, दुराचारी, अजितात्मा और ब्रह्महत्यारा बतलाते हैं।। धनानि येषां विपुलानि सन्ति नित्यं रमन्ते परलोकमूढाः। तेषामयं शत्रुवरघ्न लोको नान्यत् सुखं देहसुखे रतानाम् ॥ शत्रुसूदन! जिनके पास धनका भण्डार भरा हुआ है और जो परलोकके विषयमें कुछ भी न जाननेके कारण सदा भोग-विलासमें ही रम रहे हैं, वे केवल दैहिक सुखमें ही आसक्त हैं। अतः उनके लिये इस लोकका ही सुख सुलभ है; पारलौकिक सुख तो उन्हें कभी नहीं मिलता।। ये चैव मुक्तास्तपसि प्रयुक्ताः स्वाध्यायशीला जरयन्ति देहम्। जितेन्द्रिया भूतहिते निविष्टा- स्तेषामसौ चापि परश्च लोकः ॥ जो विषयोंकी आसक्तिसे मुक्त होकर तपस्यामें संलग्न रहते हों, जिन्होंने नित्य स्वाध्याय करते हुए अपने शरीरको दुर्बल कर दिया हो, जो इन्द्रियोंको वशमें रखते हों और समस्त प्राणियोंके हित-साधनमें लगे रहते हों, उनके लिये इस लोकका भी सुख सुलभ है और परलोकका भी।। ये चैव विद्यां न तपो न दानं न चापि मूढाः प्रजने यतन्ते। न चापि गच्छन्ति सुखानि भोगां- स्तेषामयं चापि परश्च नास्ति ॥ परंतु जो मूर्ख न विद्या पढ़ते हैं, न तप करते हैं, न दान देते हैं, न शास्त्रानुसार संतानोत्पादनका प्रयत्न करते हैं और न अन्य सुख-भोगोंका ही अनुभव कर पाते हैं, उनके लिये न इस लोकमें सुख है न परलोकमें।।
युधिष्ठिर उवाच
नारायण पुराणेश लोकावास नमोऽस्तु ते ।
श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन धर्मसारसमुच्चयम् ॥
युधिष्ठिरने कहा— भगवान्! आप साक्षात् नारायण, पुरातन ईश्वर और सम्पूर्ण जगत्के निवासस्थान हैं। आपको नमस्कार है। अब मैं सम्पूर्ण धर्मोंका सार पूर्णतया श्रवण करना चाहता हूँ ॥
श्रीभगवानुवाच
धर्मसारं महाप्राज्ञ मनुना प्रोक्तमादितः ।
प्रवक्ष्यामि मनुप्रोक्तं पौराणं श्रुतिसंहितम् ॥
श्रीभगवान् बोले— महाप्राज्ञ! मनुजीने सृष्टिके आदिकालमें जो धर्मके सार-तत्त्वका वर्णन किया है, वह पुराणोंके अनुकूल और वेदके द्वारा समर्थित है। उसी मनुप्रोक्त धर्मका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
अग्निचित्कपिला सत्री राजा भिक्षुर्महोदधिः ।
दृष्टमात्रात् पुनन्त्येते तस्मात् पश्येत तान् सदा ॥
अग्निहोत्री द्विज, कपिला गौ, यज्ञ करनेवाला पुरुष, राजा, संन्यासी और महासागर—ये दर्शनमात्रसे मनुष्यको पवित्र कर देते हैं, इसलिये सदा इनका दर्शन करना चाहिये ॥
बहुनां न प्रदातव्या गौर्वस्त्रं शयनं स्त्रियः ।
तादृग्भूतं तु तद् दानं दातारं नोपतिष्ठति ॥
एक गौ, एक वस्त्र, एक शय्या और एक स्त्रीको कभी अनेक मनुष्योंके अधिकारमें नहीं देना चाहिये; क्योंकि वैसा करनेपर उस दानका फल दाताको नहीं मिलता ॥
मा ददात्विति यो ब्रूयाद् ब्राह्मणेषु च गोषु च ।
तिर्यग्योनिशतं गत्वा चण्डालेषूपजायते ॥
जो ब्राह्मणको और गौको आहार देते समय 'मत दो' कहकर मना करता है, वह सौ बार पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेकर अन्तमें चाण्डाल होता है ॥
ब्राह्मणस्वं च यद् दैवं दरिद्रस्यैव यद् धनम् ।
गुरोश्चापि हृतं राजन् स्वर्गस्थानपि पातयेत् ॥
राजन्! ब्राह्मणका, देवताका, दरिद्रका और गुरुका धन यदि चुरा लिया जाय तो वह स्वर्गवासियोंको भी नीचे गिरा देता है ॥
धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ।
द्वितीयं धर्मशास्त्राणि तृतीयं लोकसंग्रहः ॥
जो धर्मका तत्त्व जानना चाहते हैं, उनके लिये वेद मुख्य प्रमाण हैं, धर्मशास्त्र दूसरा प्रमाण है और लोकाचार तीसरा प्रमाण है ॥
आसमुद्राच्च यत् पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात् ।
हिमाद्रिविन्ध्ययोर्मध्यमार्यावर्तं प्रचक्षते ।। पूर्व समुद्रसे लेकर पश्चिम समुद्रतक और हिमालय तथा विन्ध्याचलके बीचका जो देश है, उसे आर्यावर्त कहते हैं ।। सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तद् देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त्तं प्रचक्षते ।। सरस्वती और दृषद्वती—इन दोनों देवनदियोंके बीचका जो देवताओंद्धारा रचा हुआ देश है, उसे ब्रह्मावर्त कहते हैं ।। यस्मिन् देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः । वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ।। जिस देशमें चारों वर्णों तथा उनके अवान्तर भेदोंका जो आचार पूर्वपरम्परासे चला आता है, वही उनके लिये सदाचार कहलाता है ।। कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चालाः शूरसेनयः । एते ब्रह्मर्षिदेशास्तु ब्रह्मावर्तादनन्तराः ।। कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाल और शूरसेन—ये ब्रह्मर्षियोंके देश हैं और ब्रह्मावर्तके समीप हैं ।। एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं चरित्रं च गृह्णीयुः पृथिव्यां सर्वमानवाः ।। इस देशमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंके पास जाकर भूमण्डलके सम्पूर्ण मनुष्योंको अपने-अपने आचरणकी शिक्षा लेनी चाहिये ।। हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यत्प्राग्विशसनादपि । प्रत्यगेव प्रयागात् तु मध्यदेशः प्रकीर्तितः ।। हिमालय और विन्ध्याचलके बीचमें कुरुक्षेत्रसे पूर्व और प्रयागसे पश्चिमका जो देश है, वह मध्यदेश कहलाता है ।। कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः । स ज्ञेयो याज्ञिको देशो म्लेच्छदेशस्ततः परम् ।। जिस देशमें कृष्णसार नामक मृग स्वभावतः विचरा करता है, वही यज्ञके लिये उपयोगी देश है; उससे भिन्न म्लेच्छोंका देश है ।। एतान् विज्ञाय देशांस्तु संश्रयेरन् द्विजातयः । शूद्रस्तु यस्मिन् कस्मिन् वा निवसेद् वृत्तिकर्शितः ।। इन देशोंका परिचय प्राप्त करके द्विजातियोंको इन्हींमें निवास करना चाहिये; किंतु शूद्र जीविका न मिलनेपर निर्वाहके लिये किसी भी देशमें निवास कर सकता है ।। आचारः प्रथमो धर्मो ह्यहिंसा सत्यमेव च । दानं चैव यथाशक्ति नियमाश्च यमैः सह ।।
सदाचार, अहिंसा, सत्य, शक्तिके अनुसार दान तथा यम और नियमोंका पालन—ये मुख्य धर्म हैं ॥
वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् ।
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टिपर्यन्त सब संस्कार वेदोक्त पवित्र विधियों और मन्त्रोंके अनुसार कराना चाहिये; क्योंकि संस्कार इहलोक और परलोकमें भी पवित्र करनेवाला है ॥
गर्भहोमैर्जातकर्मनामचौलोपनायनैः ।
स्वाध्यायैस्तद् व्रतैश्चैव विवाहस्नातकव्रतैः ॥
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥
गर्भाधान-संस्कारमें किये जानेवाले हवनके द्वारा और जातकर्म, नामकरण, चूड़ाकरण, यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन, वेदोक्त व्रतोंके पालन, स्नातकके पालनेयोग्य व्रत, विवाह, पञ्चमहायज्ञोंके अनुष्ठान तथा अन्यान्य यज्ञोंके द्वारा इस शरीरको परब्रह्मकी प्राप्तिके योग्य बनाया जाता है ॥
धर्मार्थौ यदि न स्यातां शुश्रूषा वापि तद्विधा ।
विद्या तस्मिन् न वक्तव्या शुभं बीजमिवोषरे ॥
जिससे न धर्मका लाभ होता हो, न अर्थका तथा विद्याप्राप्तिके अनुकूल जो सेवा भी नहीं करता हो, उस शिष्यको विद्या नहीं पढ़नी चाहिये, ठीक उसी तरह जैसे ऊसर खेतमें उत्तम बीज नहीं बोया जाता ॥
लौकिकं वैदिकं वापि तथाऽऽध्यात्मिकमेव वा ।
यस्माज्ज्ञानमिदं प्राप्तं तं पूर्वमभिवादयेत् ॥
जिस पुरुषसे लौकिक, वैदिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ हो, उस गुरुको पहले प्रणाम करना चाहिये ॥
सव्येन सव्यं संगृह्य दक्षिणेन तु दक्षिणम् ।
न कुर्यादेकहस्तेन गुरोः पादाभिवादनम् ॥
अपने दाहिने हाथसे गुरुका दाहिना चरण और बायें हाथसे उनका बायाँ चरण पकड़कर प्रणाम करना चाहिये। गुरुको एक हाथसे कभी प्रणाम नहीं करना चाहिये ॥
निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि ।
अध्यापयति चैवैनं स विप्रो गुरुरुच्यते ॥
जो गर्भाधान आदि सब संस्कार विधिवत् कराता है और वेद पढ़ाता है, वह ब्राह्मण गुरु कहलाता है ॥
कृत्वोपनयनं वेदान् योऽध्यापयति नित्यशः ।
सकल्पान् सरहस्यांश्च स चोपाध्याय उच्यते ॥
जो उपनयन-संस्कार कराकर कल्प और रहस्यों-सहित वेदोंका नित्य अध्ययन कराता है, उसे उपाध्याय कहते हैं ।। साङ्गांश्च वेदानध्याप्य शिक्षयित्वा व्रतानि च । विवृणोति च मन्त्रार्थानाचार्यः सोऽभिधीयते ।। जो षडङ्गयुक्त वेदोंको पढ़ाकर वैदिक व्रतोंकी शिक्षा देता है और मन्त्रार्थोंकी व्याख्या करता है, वह आचार्य कहलाता है ।। उपाध्यायाद् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता । पितुः शतगुणं माता गौरवेणातिरिच्यते ।। गौरवमें दस उपाध्यायोंसे बढ़कर एक आचार्य, सौ आचार्योंसे बढ़कर पिता और सौ पितासे भी बढ़कर माता है ।। एतेषामपि सर्वेषां गरीयान् ज्ञानदो गुरुः । गुरोः परतरं किंचिन्न भूतं न भविष्यति ।। किंतु जो ज्ञान देनेवाले गुरु हैं, वे इन सबकी अपेक्षा अत्यन्त श्रेष्ठ हैं। गुरुसे बढ़कर न कोई हुआ, न होगा ।। तस्मात् तेषां वशे तिष्ठेच्छुश्रूषापरमो भवेत् । अवमानाद्धि तेषां तु नरकं स्यान्न संशयः ।। इसलिये मनुष्यको उपर्युक्त गुरुजनोंके अधीन रहकर उनकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहना चाहिये। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि गुरुजनोंके अपमानसे नरकमें गिरना पड़ता है ।। हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान् विद्याहीनान् वयोऽधिकान् । रूपद्रविणहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत् ।। जो लोग किसी अंगसे हीन हों, जिनका कोई अंग अधिक हो, जो विद्यासे हीन, अवस्थाके बूढ़े, रूप और धनसे रहित तथा जातिसे भी नीच हों, उनपर आक्षेप नहीं करना चाहिये ।। शपता यत् कृतं पुण्यं शप्यमानं तु गच्छति । शप्यमानस्य यत् पापं शपन्तमनुगच्छति ।। क्योंकि आक्षेप करनेवाले मनुष्यका पुण्य, जिसका आक्षेप किया जाता है, उसके पास चला जाता है और उसका पाप आक्षेप करनेवालेके पास चला आता है ।। नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं विवर्जयेत् ।। नास्तिकता, वेदोंकी निन्दा, देवताओंपर दोषारोपण, द्वेष, दम्भ, अभिमान, क्रोध तथा कठोरता—इनका परित्याग कर देना चाहिये ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[अग्निके स्वरूपमें अग्निहोत्रकी विधि तथा उसके माहात्म्यका वर्णन]
[अग्निके स्वरूपमें अग्निहोत्रकी विधि तथा उसके माहात्म्यका वर्णन] युधिष्ठिर उवाच कथं तद् ब्राह्मणैर्देव होतव्यं क्षत्रियैः कथम् । वैश्यैर्वा देवदेवेश कथं वा सुहुतं भवेत् ॥ युधिष्ठिरने पूछा— देवदेवेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको किस प्रकार हवन करना चाहिये? और उनके द्वारा किस प्रकार किया हुआ हवन शुभ होता है? ॥
कत्यग्नयः किमात्मानः स्थानं किं कस्य वा विभो । कतरस्मिन् हुते स्थानं कं व्रजेदग्निहोत्रिकः ॥ विभो! अग्निके कितने भेद हैं? उनके पृथक्-पृथक् स्वरूप क्या हैं? किस अग्निका कहाँ स्थान है? अग्निहोत्री पुरुष किस अग्निमें हवन करके किस लोकको प्राप्त होता है? ॥
अग्निहोत्रनिमित्तं च किमुत्पन्नं पुरानघ । कथमेवाथ हूयन्ते प्रीयन्ते च सुराः कथम् ॥ निष्पाप! पूर्वकालमें अग्निहोत्र किसके निमित्तसे उत्पन्न हुआ था? देवताओंके लिये किस प्रकार हवन किया जाता है और कैसे उनकी तृप्ति होती है? ॥
विधिवन्मन्त्रवत् कृत्वा पूजितास्त्वग्नयः कथम् । कां गतिं वदतां श्रेष्ठ नयन्ति ह्यग्निहोत्रिणः ॥ प्रवक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! विधिके अनुसार मन्त्रोंसहित पूजा की जानेपर तीनों अग्नियाँ अग्निहोत्रीको किस प्रकार किस गतिको प्राप्त कराती हैं? ॥
दुर्हुताश्चापि भगवन्नविज्ञातास्त्रयोऽग्नयः । किमाहिताग्नेः कुर्वन्ति दुश्शीर्णा वापि केशव ॥ भगवन्! केशव! यदि तीनों अग्नियोंके स्वरूपको न जानकर उनमें अविधिपूर्वक हवन किया जाय अथवा उनकी उपासनामें त्रुटि रह जाय तो वे त्रिविध अग्नि अग्निहोत्रीका क्या अनिष्ट करते हैं? ॥
उत्सन्नाग्निस्तु पापात्मा कां योनिं देव गच्छति । एतत् सर्वं समासेन भक्त्या ह्युपगतस्य मे । वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ सर्वाधिक नमोऽस्तु ते ॥ देवेश्वर! जिसने अग्निका परित्याग कर दिया हो, वह पापात्मा किस योनिमें जन्म लेता है? ये सारी बातें संक्षेपमें मुझे सुनाइये; क्योंकि मैं भक्तिभावसे आपकी शरणमें आया हूँ। भगवन्! आप सर्वज्ञ हैं, सबसे महान् हैं; अतः आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥
श्रीभगवानुवाच शृणु राजन् महापुण्यमिदं धर्मामृतं परम् । यत् तु तारयते युक्तान् ब्राह्मणानग्निहोत्रिणः ॥
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! इस महान् पुण्यदायक और परम धर्मरूपी अमृतका वर्णन सुनो। यह धर्मपरायण अग्निहोत्री ब्राह्मणोंको भवसागरसे पार कर देता है।।
ब्रह्मत्वेनासृजं लोकानहमादौ महाद्युते।
सृष्टोऽग्निर्मुखतः पूर्वं लोकानां हितकाम्यया।।
महातेजस्वी महाराज! मैंने सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्मस्वरूपसे सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की और लोगोंकी भलाईके लिये अपने मुखसे सर्वप्रथम अग्निको प्रकट किया।।
यस्मादग्रे स भूतानां सर्वेषां निर्मितो मया।
तस्मादग्नीत्यभिहितः पुराणज्ञैर्मनीषिभिः।।
इस प्रकार अग्नि-तत्त्व मेरे द्वारा सब भूतोंके पहले उत्पन्न किया गया है, इसलिये पुराणोंके ज्ञाता मनीषी विद्वान् उसे अग्नि कहते हैं।।
यस्मात् तु सर्वकृत्येषु पूर्वमस्मै प्रदीयते।
आहुतिर्दीप्यमानाय तस्मादग्नीति कथ्यते।।
समस्त कार्योंमें सबसे आगे प्रज्वलित आगमें ही आहुति दी जाती है, इसलिये यह अग्नि कहा जाता है।।
यस्माच्च तु नयत्यग्रां गतिं विप्रान् सुपूजितः।
तस्माच्च नयनाद् राजन् देवेष्वग्नीति कथ्यते।।
राजन्! यह भलीभाँति पूजित होनेपर ब्राह्मणोंको अग्र्यगति (परमपद)-की प्राप्ति कराता है, इसलिये भी देवताओंमें अग्निके नामसे विख्यात है।।
यस्माच्च दुर्हुतः सोऽयमलं भक्षयितुं क्षणात्।
यजमानं नरश्रेष्ठ क्रव्यादोऽग्निस्ततः स्मृतः।।
सर्वभूतात्मको राजन् देवानामेष वै मुखम्।
नरोत्तम! यदि इसमें विधिका उल्लङ्घन करके हवन किया जाय तो यह एक क्षणमें ही यजमानको खा जानेकी शक्ति रखता है, इसलिये अग्निको क्रव्याद कहा गया है। राजन्! यह अग्नि सम्पूर्ण भूतोंका स्वरूप और देवताओंका मुख है।।
तेन सप्तर्षयः सिद्धाः संयतेन्द्रियबुद्धयः।
गता ह्यमरसायुज्यं ते ह्यग्न्यर्चनतत्पराः।।
अतः इन्द्रियों और मन-बुद्धिपर संयम रखनेवाले सिद्ध सप्तर्षिगण अग्निकी आराधनामें तत्पर रहनेके कारण ही देवताओंके स्वरूपको प्राप्त हुए हैं।।
अग्निहोत्रप्रकारं च शृणु राजन् समाहितः।
त्रयाणां गुणनामानि वह्नीनामुच्यते मया।।
राजन्! अब एकाग्रचित्त होकर अग्निहोत्रका प्रकार सुनो। अब मैं तीनों अग्नियोंके गुणके अनुसार नाम बता रहा हूँ।।
गृहाणां हि पतित्वं हि गृहपत्यमिति स्मृतम्।
गृहपत्यं तु यस्यासीत् तत् तस्माद् गार्हपत्यता ।। गृहोंका आधिपत्य ही गृहपत्य माना गया है। यह गृहपत्य जिस अग्निमें प्रतिष्ठित है, वही 'गार्हपत्य अग्नि' के नामसे प्रसिद्ध है ।। यजमानं तु यस्मात् तु दक्षिणां तु गतिं नयेत् । दक्षिणाग्निं तमाहुस्ते दक्षिणायतनं द्विजाः ।। जो अग्नि यजमानको दक्षिण मार्गसे स्वर्गमें ले जाता है, उस दक्षिणमें रहनेवाले अग्निको ब्राह्मणलोग 'दक्षिणाग्नि' कहते हैं ।। आहुतिः सर्वमाख्याति हव्यं वै वहनं स्मृतम् । सर्वहव्यवहो वह्निर्गतश्चाहवनीयताम् ।। 'आहुति' शब्द सर्वका वाचक है और हवन नाम ही है हव्यका। सब प्रकारके हव्यको स्वीकार करनेवाला वह्नि 'आहवनीय अग्नि' कहलाता है ।। ब्रह्मा च गार्हपत्योऽग्निस्तस्मिन्नेव हि सोऽभवत् । दक्षिणाग्निस्त्वयं रुद्रः क्रोधात्मा चण्ड एव सः ।। गार्हपत्य अग्नि ब्रह्माका स्वरूप है, क्योंकि ब्रह्माजीसे ही उसका प्रादुर्भाव हुआ है और यह दक्षिणाग्नि रुद्रस्वरूप है, क्योंकि वह क्रोधरूप और प्रचण्ड है ।। अहमाहवनीयोऽग्निराहोमाद् यस्य वै मुखे । होमके आरम्भसे लेकर अन्ततक जिसके मुखमें आहुति डाली जाती है, वह आहवनीय अग्नि स्वयं मैं हूँ ।। पृथिवीमन्तरिक्षं च दिवमृषिगणैः सह । जयत्याहवनीयं यो जुहुयाद् भक्तिमान् नरः ।। जो मनुष्य भक्तियुक्त चित्तसे प्रतिदिन आहवनीय अग्निमें हवन करता है, वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष और ऋषियों-सहित स्वर्गलोकपर भी अधिकार प्राप्त कर लेता है ।। आभिमुख्येन होमस्तु यस्य यज्ञेषु वर्तते । तेनाप्याहवनीयत्वं गतो वह्निर्महाद्युतिः ।। यज्ञोंमें सब ओरसे अग्निके मुखमें हवन किया जाता है, इसलिये वह अत्यन्त कान्तिमान् अग्नि 'आहवनीय' संज्ञाको प्राप्त होता है ।। आहोमादग्निहोत्रेषु यज्ञैर्वा यत्र सर्वशः । यस्मात् तस्मात् प्रवर्तन्ते ततो ह्याहवनीयता ।। अग्निहोत्र अथवा अन्यान्य यज्ञोंमें होमके आरम्भसे ही अग्निके भीतर सब प्रकारसे आहुति डाली जाती है, इसलिये भी उसे आहवनीय कहते हैं ।। आध्यात्मिकं चाधिदैवमाधिभौतिकमेव च । एतत् तापत्रयं प्रोक्तमात्मवद्भिर्र्नराधिप ।।
नरेश्वर! आत्मवेत्ता विद्वानोंने आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—ये तीन प्रकारके दुःख बतलाये हैं ।।
यस्माद् वै त्रायते दुःखाद् यजमानं हुतोऽनलः ।
तस्मात् तु विधिवत् प्रोक्तमग्निहोत्रमिति श्रुतौ ।।
विधिवत् होम करनेपर अग्नि इन तीनों प्रकारके दुःखोंसे यजमानका त्राण करता है, इसलिये उस कर्मको वेदमें अग्निहोत्र नाम दिया गया है ।।
तदग्निहोत्रं सृष्टं वै ब्राह्मणा लोककर्तृणा ।
वेदाश्चाप्यग्निहोत्रं तु जज्ञिरे स्वयमेव तु ।।
विश्वविधाता ब्रह्माजीने ही सबसे पहले अग्निहोत्रको प्रकट किया। वेद और अग्निहोत्र स्वतः उत्पन्न हुए हैं ।।
अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ।
रतिपुत्रफला दारा दत्तभुक्तफलं धनम् ।।
वेदाध्ययनका फल अग्निहोत्र है (अर्थात् वेद पढ़कर जिसने अग्निहोत्र नहीं किया, उसका वह अध्ययन निष्फल है)। शास्त्रज्ञानका फल शील और सदाचार है, स्त्रीका फल रति और पुत्र है तथा धनकी सफलता दान और उपभोग करनेमें है ।।
त्रिवेदमन्त्रसंयोगादग्निहोत्रं प्रवर्तते ।
ऋग्यजुः सामभिः पुण्यैः स्थाप्यते सूत्रसंयुतैः ।।
तीनों वेदोंके मन्त्रोंके संयोगसे अग्निहोत्रकी प्रवृत्ति होती है। ऋक्, यजुः और सामवेदके पवित्र मन्त्रों तथा मीमांसासूत्रोंके द्वारा अग्निहोत्र-कर्मका प्रतिपादन किया जाता है ।।
वसन्ते ब्राह्मणस्य स्यादाधेयोऽग्निर्नराधिप ।
वसन्तो ब्राह्मणो ज्ञेयो वेदयोनिः स उच्यते ।।
नरेश्वर! वसन्त-ऋतुको ब्राह्मणका स्वरूप समझना चाहिये तथा वह वेदकी योनिरूप है, इसलिये ब्राह्मणको वसन्त-ऋतुमें अग्निकी स्थापना करनी चाहिये ।।
अग्न्याधेयं तु येनाथ वसन्ते क्रियतेऽनघ ।
तस्य श्रीर्ब्रह्मवृद्धिश्च ब्राह्मणस्य विवर्धते ।।
निष्पाप! जो वसन्त-ऋतुमें अग्न्याधान करता है, उस ब्राह्मणकी श्रीवृद्धि होती है तथा उसका वैदिक ज्ञान भी बढ़ता है ।।
क्षत्रियस्याग्निराधेयो ग्रीष्मे श्रेष्ठः स वै नृप ।
येनाधानं तु वै ग्रीष्मे क्रियते तस्य वर्धते ।
श्रीः प्रजाः पशवश्चैव वित्तं तेजो बलं यशः ।।
राजन्! क्षत्रियके लिये ग्रीष्म-ऋतुमें अग्न्याधान करना श्रेष्ठ माना गया है। जो क्षत्रिय ग्रीष्म-ऋतुमें अग्नि-स्थापना करता है, उसकी सम्पत्ति, प्रजा, पशु, धन, तेज, बल और
यशकी अभिवृद्धि होती है ।। शरदृतौ तु वैश्यस्य ह्याधानीयो हुताशनः । शरद्रात्रं स्वयं वैश्यो वैश्ययोनिः स उच्यते ।। शरत्कालकी रात्रि साक्षात् वैश्यका स्वरूप है, इसलिये वैश्यको शरद्-ऋतुमें अग्निका आधान करना चाहिये; उस समयकी स्थापित की हुई अग्निको वैश्य योनि कहते हैं ।। शरद्याधानमेवं वै क्रियते येन पाण्डव । तस्यापि श्रीः प्रजायुश्च पशवोऽर्थश्च वर्धते ।। पाण्डुनन्दन! जो वैश्य शरद्-ऋतुमें अग्निकी स्थापना करता है, उसकी सम्पत्ति, प्रजा, आयु, पशु और धनकी वृद्धि होती है ।। रसाः स्नेहास्तथा गन्धा रत्नानि मणयस्तथा । काञ्चनानि च लौहानि ह्यग्निहोत्रकृतेऽभवन् ।। सब प्रकारके रस, घी आदि स्निग्ध पदार्थ, सुगन्धित द्रव्य, रत्न, मणि, सुवर्ण और लोहा—इन सबकी उत्पत्ति अग्निहोत्रके लिये ही है ।। आयुर्वेदो धनुर्वेदो मीमांसा न्यायविस्तरः । धर्मशास्त्रं च तत्सर्वमग्निहोत्रकृते कृतम् ।। अग्निहोत्रको ही जाननेके लिये आयुर्वेद, धनुर्वेद, मीमांसा, विस्तृत न्याय-शास्त्र और धर्मशास्त्रका निर्माण किया गया है ।। छन्दः शिक्षा च कल्पश्च तथा व्याकरणानि च । शास्त्रं ज्योतिर्निरुक्तं चाप्यग्निहोत्रकृते कृतम् ।। छन्द, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्यौतिषशास्त्र और निरुक्त भी अग्निहोत्रके लिये ही रचे गये हैं ।। इतिहासपुराणं च गाथाश्चोपनिषत् तथा । आथर्वणानि कर्माणि चाग्निहोत्रकृते कृतम् ।। इतिहास, पुराण, गाथा, उपनिषद् और अथर्ववेदके कर्म भी अग्निहोत्रके लिये ही हैं ।। तिथिनक्षत्रयोगानां मुहूर्तकरणात्मकम् । कालस्य वेदनार्थं तु ज्योतिर्ज्ञानं पुरानघ ।। निष्पाप! तिथि, नक्षत्र, योग, मुहूर्त और करणरूप कालका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें ज्योतिष-शास्त्रका निर्माण हुआ है ।। ऋग्यजुःसाममन्त्राणां श्लोकतत्त्वार्थचिन्तनात् । प्रत्यापत्तिविकल्पानां छन्दोज्ञानं प्रकल्पितम् ।। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंके छन्दका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तथा संशय और विकल्पके निराकरणपूर्वक उनका तात्त्विक अर्थ समझनेके लिये छन्दःशास्त्रकी रचना की गयी है ।।
वर्णाक्षरपदार्थानां संधिलिङ्गं प्रकीर्तितम् ।
नामधातुविवेकर्थ पुरा व्याकरणं स्मृतम् ॥
वर्ण, अक्षर और पदोंके अर्थका, संधि और लिङ्गका तथा नाम और धातुका विवेक होनेके लिये पूर्वकालमें व्याकरणशास्त्रकी रचना हुई है ।।
यूपवेद्यध्वरार्थं तु प्रोक्षणश्रपणाय तु ।
यज्ञदैवतयोगर्थं शिक्षाज्ञानं प्रकल्पितम् ॥
यूप, वेदी और यज्ञका स्वरूप जाननेके लिये, प्रोक्षण और श्रपण (चरु पकाना) आदिकी इतिकर्तव्यताको समझनेके लिये तथा यज्ञ और देवताके सम्बन्धका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये शिक्षा नामक वेदांगकी रचना हुई है ।।
यज्ञपात्रपवित्रार्थं द्रव्यसम्भारणाय च ।
सर्वयज्ञविकल्पाय पुरा कल्पं प्रकीर्तितम् ॥
यज्ञके पात्रोंकी शुद्धि, यज्ञसम्बन्धी सामग्रियोंके संग्रह तथा समस्त यज्ञोंके वैकल्पिक विधानोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें कल्पशास्त्रका निर्माण किया गया है ।।
नामधातुविकल्पानां तत्त्वार्थनियमाय च ।
सर्ववेदनिरुक्तानां निरुक्तमृषिभिः कृतम् ॥
सम्पूर्ण वेदोंमें प्रयुक्त नाम, धातु और विकल्पोंके तात्त्विक अर्थका निश्चय करनेके लिये ऋषियोंने निरुक्तकी रचना की है ।।
वेद्यर्थं पृथिवी सृष्टा सम्भारार्थं तथैव च ।
इध्मार्थमथ यूपार्थं ब्रह्मा चक्रे वनस्पतिम् ॥
यज्ञकी वेदी बनाने तथा अन्य सामग्रियोंको धारण करनेके लिये ब्रह्माजीने पृथ्वीकी सृष्टि की है। समिधा और यूप बनानेके लिये वनस्पतियोंकी रचना की है ।।
गावो यज्ञार्थमुत्पन्ना दक्षिणार्थं तथैव च ।
सुवर्णं रजतं चैव पात्रकुम्भार्थमेव च ॥
गौएँ यज्ञ और दक्षिणाके लिये उत्पन्न हुई हैं, क्योंकि गोघृत और गोदक्षिणाके बिना यज्ञ सम्पन्न नहीं होता। सुवर्ण और चाँदी—ये यज्ञके पात्र और कलश बनानेका काम लेनेके लिये पैदा हुए हैं ।।
दर्भाः संस्तरणार्थं तु रक्षसां रक्षणाय च ।
पूजनार्थं द्विजाः सृष्टास्तारका दिवि देवताः ॥
कुशोंकी उत्पत्ति हवनकुण्डके चारों ओर फैलाने और राक्षसोंसे यज्ञकी रक्षा करनेके लिये हुई है। पूजन करनेके लिये ब्राह्मणोंको, नक्षत्रोंको और स्वर्गके देवताओंको उत्पन्न किया गया है ।।
क्षत्रियाः रक्षणार्थं तु वैश्या वार्त्तानिमित्ततः ।
शुश्रूषार्थं त्रयाणां वै शूद्राः सृष्टाः स्वयम्भुवा ॥
सबकी रक्षाके लिये क्षत्रिय-जातिकी सृष्टि की गयी है। कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य आदि जीविकाका साधन जुटानेके लिये वैश्योंकी उत्पत्ति हुई है और तीनों वर्णोंकी सेवाके लिये ब्रह्माजीने शूद्रोंको उत्पन्न किया है॥
यथोक्तमग्निहोत्राणां शुश्रूषन्ति च ये द्विजाः।
तैर्दत्तं सहुतं चेष्टं दत्तमध्यापितं भवेत्॥
जो द्विज विधिपूर्वक अग्निहोत्रका सेवन करते हैं, उनके द्वारा दान, होम, यज्ञ और अध्यापन—ये समस्त कर्म पूर्ण हो जाते हैं॥
एवमिष्टं च पूर्तं च यद् विप्रैः क्रियते नृप।
तत् सर्वं सम्यगाहृत्य चादित्ये स्थापयाम्यहम्॥
राजन्! इसी प्रकार ब्राह्मणोंके द्वारा जो यज्ञ करने, बगीचे लगाने और कुएँ खुदवाने आदिके कार्य होते हैं, उन सबके पुण्यको लेकर मैं सूर्यमण्डलमें स्थापित कर देता हूँ॥
मया स्थापितमादित्ये लोकस्य सुकृतं हि तत्।
धारयेद् यत् सहस्रांशुः सुकृतं ह्यग्निहोत्रिणाम्॥
मेरे द्वारा आदित्यमें स्थापित किये हुए संसारके पुण्य और अग्निहोत्रियोंके सुकृतको सहस्रों किरणोंवाले सूर्यदेव धारण किये रहते हैं॥
तस्मादप्रोषितैर्नित्यमग्निहोत्रं द्विजातिभिः।
होतव्यं विधिवद् राजन्नूर्ध्वमिच्छन्ति ये गतिम्॥
इसलिये राजन्! जो द्विज परदेशमें न रहते हों और ऊर्ध्वगतिको प्राप्त करना चाहते हों, उन्हें प्रतिदिन विधिपूर्वक अग्निहोत्र करना चाहिये॥
आत्मवन्नावमन्तव्यमग्निहोत्रं युधिष्ठिर।
न त्याज्यं क्षणमप्येतदग्निहोत्रं युधिष्ठिर॥
महाराज युधिष्ठिर! अग्निहोत्रको अपने आत्माके समान समझकर कभी भी उसका अपमान या एक क्षणके लिये भी त्याग नहीं करना चाहिये॥
बालाहिताग्नयो ये च शूद्रान्नाद् विरताः सदा।
क्रोधलोभविनिर्मुक्ताः प्रातःस्नानपरायणाः।
यथोक्तमग्निहोत्रं वै जुह्वते विजितेन्द्रियाः॥
आतिथेयाः सदा सौम्या द्विकालं मत्परायणाः।
ते यान्त्यपुनरावृत्तिं भित्त्वा चादित्यमण्डलम्॥
जो बाल्यकालसे ही अग्निहोत्रका सेवन करते और शूद्रके अन्नसे सदा दूर रहते हैं, जो क्रोध और लोभसे रहित हैं, जो प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके जितेन्द्रियभावसे विधिवत् अग्निहोत्रका अनुष्ठान करते हैं, सदा अतिथिकी सेवामें लगे रहते हैं तथा शान्तभावसे रहकर दोनों समय मेरे परायण होकर मेरा ध्यान करते हैं, वे सूर्यमण्डलको भेदकर मेरे परम धामको प्राप्त होते हैं, जहाँसे पुनः इस संसारमें नहीं लौटना पड़ता॥
श्रुतिं केचिन्निन्दमानाः श्रुतिं दूष्यन्त्यबुद्धयः ।
प्रमाणं न च कुर्वन्ति ये यान्तीहापि दुर्गतिम् ।।
इस संसारमें कुछ मूर्ख मनुष्य श्रुतिपर दोषारोपण करते हुए उसकी निन्दा करते हैं तथा उसे प्रमाणभूत नहीं मानते, ऐसे लोगोंकी बड़ी दुर्गति होती है ।।
प्रमाणमितिहासं च वेदान् कुर्वन्ति ये द्विजाः ।
ते यान्त्यमरसायुज्यं नित्यमास्तिक्यबुद्धयः ।।
परंतु जो द्विज नित्य आस्तिक्यबुद्धिसे युक्त होकर वेदों और इतिहासोंको प्रामाणिक मानते हैं, वे देवताओंका सायुज्य प्राप्त करते हैं ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[चान्द्रायण-व्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन]
[चान्द्रायण-व्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन]
युधिष्ठिर उवाच
चक्रायुध नमस्तेऽस्तु देवेश गरुडध्वज ।
चान्द्रायणविधिं पुण्यमाख्याहि भगवन् मम ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**चक्रधारी देवेश्वर! आपको नमस्कार है। गरुडध्वज भगवन्! अब आप मुझसे चान्द्रायणकी परम पावन विधिका वर्णन कीजिये ॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु पाण्डव तत्त्वेन सर्वपापप्रणाशनम् ।
पापिनो येन शुद्ध्यन्ति तत् ते वक्ष्यामि सर्वशः ॥
**श्रीभगवान् बोले—**पाण्डुनन्दन! समस्त पापोंका नाश करनेवाले चान्द्रायण-व्रतका यथार्थ वर्णन सुनो। इसके आचरणसे पापी मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं। उसे मैं तुम्हें पूर्णतया बताता हूँ ॥
ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वैश्यो वा चरितव्रतः ।
यथावत् कर्तुकामो वै तस्यैवं प्रथमा क्रिया ॥
शोधयेत् तु शरीरं स्वं पञ्चगव्येन यन्त्रितः ।
सशिरः कृष्णपक्षस्य ततः कुर्वीत वापनम् ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य—जो कोई भी चान्द्रायण-व्रतका विधिवत् अनुष्ठान करना चाहते हों, उनके लिये पहला काम यह है कि वे नियमके अंदर रहकर पञ्चगव्यके द्वारा समस्त शरीरका शोधन करें। फिर कृष्णपक्षके अन्तमें मस्तकसहित दाढ़ी-मूँछ आदिका मुण्डन करावें ॥
शुक्लवासाः शुचिर्भूत्वा मौञ्जीं बध्नीत मेखलाम् ।
पालाशदण्डमादाय ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ॥
तत्पश्चात् स्नान करके शुद्ध हो श्वेत वस्त्र धारण करें, कमरमें मूँजकी बनी हुई मेखला बाँधे और पलाशका दण्ड हाथमें लेकर ब्रह्मचारीके व्रतका पालन करते रहें ॥
कृतोपवासः पूर्वं तु शुक्लप्रतिपदि द्विजः ।
नदीसंगमतीर्थेषु शुचौ देशे गृहेऽपि वा ॥
द्विजको चाहिये कि वह पहले दिन उपवास करके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको नदियोंके संगमपर, किसी पवित्र स्थानमें अथवा घरपर ही व्रत आरम्भ करे ॥
आघारावाज्यभागौ च प्रणवं व्याहृतीस्तथा ।
वारुणं चैव पञ्चैव हुत्वा सर्वान् यथाक्रमम् ॥
सत्याय विष्णवे चेति ब्रह्मर्षिभ्योऽथ ब्रह्मणे ।
विश्वेभ्यो हि च देवेभ्यः सप्रजापतये तथा ।। षडुक्ता जुहुयात् पश्चात् प्रायश्चित्ताहुतिं द्विजः । पहले नित्य-नियमसे निवृत्त होकर एक वेदीपर अग्निकी स्थापना करे और उसमें क्रमशः आघार, आज्यभाग, प्रणव, महाव्याहृति और पञ्चवारुण होम करके सत्य, विष्णु, ब्रह्मर्षिगण, ब्रह्मा, विश्वेदेव तथा प्रजापति—इन छः देवताओंके निमित्त हवन करे। अन्तमें प्रायश्चित्त-होम करे ।। अतः समापयेदग्निं शान्तिं कृत्वाथ पौष्टिकम् ।। प्रणम्य चाग्निं सोमं च भस्म धृत्वा यथाविधि । नदीं गत्वा विशुद्धात्मा सोमाय वरुणाय च । आदित्याय नमस्कृत्या ततः स्नायात् समाहितः ।। फिर शान्ति और पौष्टिक कर्मका अनुष्ठान करके अग्निमें हवनका कार्य समाप्त कर दे। तत्पश्चात् अग्नि तथा सोमदेवताको प्रणाम करे और विधिपूर्वक शरीरमें भस्म लगाकर नदीके तटपर जा विशुद्धचित्त होकर सोम, वरुण तथा आदित्यको प्रणाम करके एकाग्र भावसे जलमें स्नान करे ।। उत्तीर्योदकमाचम्य चासीनः पूर्वतोमुखः । प्राणायामं ततः कृत्वा पवित्रैरभिषेचनम् ।। इसके बाद बाहर निकलकर आचमन करनेके पश्चात् पूर्वाभिमुख होकर बैठे और प्राणायाम करके कुशकी पवित्रीसे अपने शरीरका मार्जन करे ।। आचान्तस्त्वभिवीक्षेत ऊर्ध्वबाहुर्दिवाकरम् । कृताञ्जलिपुटः स्थित्वा कुर्याच्चैव प्रदक्षिणम् ।। फिर आचमन करके दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्यका दर्शन करे और हाथ जोड़कर खड़ा हो सूर्यकी प्रदक्षिणा करे ।। नारायणं वा रुद्रं वा ब्रह्माणमथवापि वा । वारुणं मन्त्रसूक्तं वा प्राग्भोजनमथापि वा ।। उसके बाद भोजनसे पूर्व ही नारायण, रुद्र, ब्रह्मा या वरुणसम्बन्धी सूक्तका पाठ करे ।। वीरघ्नमृषथं वापि तथा चाप्यघमर्षणम् । गायत्रीं मम देवीं वा सावित्रीं वा जपेत् ततः । शतं वाष्टशतं वापि सहस्रमथवा परम् ।। अथवा वीरघ्न, ऋषभ, अघमर्षण, गायत्री या मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले वैष्णव गायत्री-मन्त्रका जप करे। यह जप सौ बार या एक सौ आठ बार अथवा एक हजार बार करना चाहिये ।। ततो मध्याह्नकाले वै पायसं यावकं हि वा ।
पाचयित्वा प्रयत्नेन प्रयतः सुसमाहितः ।। तदनन्तर पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर मध्याह्नकालमें यत्नपूर्वक खीर या जौकी लप्सी बनाकर तैयार करे ।।
पात्रं तु सुसमादाय सौवर्णं रजतं तु वा । ताम्रं वा मृन्मयं वापि औदुम्बरमथापि वा ।। वृक्षाणां यज्ञियानां तु पर्णैरार्द्रैरकुत्सितैः । पुटकेन तु गुप्तेन चरेद् भैक्षं समाहितः ।। अथवा सोने, चाँदी, ताँबे, मिट्टी या गूलरकी लकड़ीका पात्र अथवा यज्ञके लिये उपयोगी वृक्षोंके हरे पत्तोंका दोना बनाकर हाथमें ले ले और उसको ऊपरसे ढक ले। फिर सावधानतापूर्वक भिक्षाके लिये जाय ।।
ब्राह्मणानां गृहाणां तु सप्तानां नापरं व्रजेत् । गोदोहमात्रं तिष्ठेत् तु वाग्यतः संयतेन्द्रियः ।। सात ब्राह्मणोंके घरपर जाकर भिक्षा माँगे, सातसे अधिक घरोंपर न जाय। गौ दुहनेमें जितनी देर लगती है, उतने ही समयतक एक द्वारपर खड़ा होकर भिक्षाके लिये प्रतीक्षा करे, मौन रहे और इन्द्रियोंपर काबू रखे ।।
न हसेन्न च वीक्षेत नाभिभाषेत वा स्त्रियम् ।। भिक्षा माँगनेवाला पुरुष न तो हँसे, न इधर-उधर दृष्टि डाले और न किसी स्त्रीसे बातचीत करे ।।
दृष्ट्वा मूत्रं पुरीषं वा चाण्डालं वा रजस्वलाम् । पतितं च तथा श्वानमादित्यमवलोकयेत् ।। यदि मल, मूत्र, चाण्डाल, रजस्वला स्त्री, पतित मनुष्य तथा कुत्तेपर दृष्टि पड़ जाय तो सूर्यका दर्शन करे ।।
ततस्त्वावसथं प्राप्तो भिक्षां निक्षिप्य भूतले । प्रक्षाल्य पादावाजान्वोर्हस्तावाकूर्परं पुनः । आचम्य वारिणा तेन वह्निं विप्रांश्च पूजयेत् ।। तदनन्तर अपने निवासस्थानपर आकर भिक्षापात्रको जमीनपर रख दे और पैरोंको घुटनोंतक तथा हाथोंको दोनों कोहनियोंतक धो डाले। इसके बाद जलसे आचमन करके अग्नि और ब्राह्मणोंकी पूजा करे ।।
पञ्च सप्ताथवा कुर्याद् भागान् भैक्ष्यस्य तस्य वै । तेषामन्यतमं पिण्डमादित्याय निवेदयेत् ।। फिर उस भिक्षाके पाँच या सात भाग करके उतने ही ग्रास बना ले। उनमेंसे एक ग्रास सूर्यको निवेदन करे ।।
ब्रह्मणे चाग्नये चैव सोमाय वरुणाय च ।
विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो दद्यादन्नं यथाक्रमम् ॥
फिर क्रमशः ब्रह्मा, अग्नि, सोम, वरुण तथा विश्वेदेवोंको एक-एक ग्रास दे ॥
अवशिष्टमथैकं तु वक्त्रमात्रं प्रकल्पयेत् ।
अन्तमें जो एक ग्रास बच जाय, उसको ऐसा बना ले, जिससे वह सुगमतापूर्वक मुँहमें आ सके ॥
अङ्गुल्यग्रे स्थितं पिण्डं गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् ।
अङ्गुलीभिस्त्रिभिः पिण्डं प्राश्नीयात् प्राङ्मुखः शुचिः ॥
फिर पवित्र भावसे पूर्वाभिमुख होकर उस ग्रासको दाहिने हाथकी अंगुलियोंके अग्रभागपर रखकर गायत्री-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे और तीन अंगुलियोंसे ही उसे मुँहमें डालकर खा जाय ॥
यथा च वर्धते सोमो ह्रसते च यथा पुनः ।
तथा पिण्डाश्च वर्धन्ते ह्रसन्ते च दिने दिने ॥
जैसे चन्द्रमा शुक्लपक्षमें प्रतिदिन बढ़ता है और कृष्णपक्षमें प्रतिदिन घटता रहता है, उसी प्रकार ग्रासोंकी मात्रा भी शुक्लपक्षमें बढ़ती है और कृष्णपक्षमें घटती रहती है ॥*
त्रिकालं स्नानमस्योक्तं द्विकालमथवा सकृत् ।
ब्रह्मचारी सदा वापि न च वस्त्रं प्रपीडयेत् ॥
चान्द्रायण-व्रत करनेवालेके लिये प्रतिदिन तीन समय, दो समय अथवा एक समय भी स्नान करनेका विधान मिलता है। उसे सदा ब्रह्मचारी रहना चाहिये और तर्पणके पूर्व वस्त्र नहीं निचोड़ना चाहिये ॥
स्थाने न दिवसं तिष्ठेद् रात्रौ वीरासनं व्रजेत् ।
भवेत् स्थण्डिलशायी वाप्यथवा वृक्षमूलिकः ॥
दिनमें एक जगह खड़ा न रहे, रातको वीरासनसे बैठे अथवा वेदीपर या वृक्षकी जड़पर सो रहे ॥
वल्कलं यदि वा क्षौमं शाणं कार्पासिकं तथा ।
आच्छादनं भवेत् तस्य वस्त्रार्थं पाण्डुनन्दन ॥
पाण्डुनन्दन! उसे शरीर ढकनेके लिये वल्कल, रेशम, सन अथवा कपासका वस्त्र धारण करना चाहिये ॥
एवं चान्द्रायणे पूर्णे मासस्यान्ते प्रयत्नवान् ।
ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या दद्याच्चैव च दक्षिणाम् ॥
इस प्रकार एक महीने बाद चान्द्रायणव्रत पूर्ण होनेपर उद्योग करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा दे ॥
चान्द्रायणेन चीर्णेन यत् कृतं तेन दुष्कृतम् ।
तत् सर्वं तत्क्षणादेव भस्मीभवति काष्ठवत् ॥
चान्द्रायण-व्रतके आचरणसे मनुष्यके समस्त पाप सूखे काठकी भाँति तुरंत जलकर खाक हो जाते हैं ।।
ब्रह्महत्या च गोहत्या सुवर्णस्तेन्यमेव च ।
भ्रूणहत्या सुरापानं गुरोर्दारव्यतिक्रमः ॥
एवमन्यानि पापानि पातकीयानि यानि च ।
चान्द्रायणेन नश्यन्ति वायुना पांसवो यथा ॥
ब्रह्महत्या, गोहत्या, सुवर्णकी चोरी, भ्रूणहत्या, मदिरापान और गुरु-स्त्री-गमन तथा और भी जितने पाप या पातक हैं, वे चान्द्रायण-व्रतसे उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे हवाके वेगसे धूल उड़ जाती है ।।
अनिर्देशाया गोः क्षीरमौष्ट्रमाविकमेव च ।
मृतसूतकयोश्चान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
जिस गौको ब्याये हुए दस दिन भी न हुए हों, उसका दूध तथा ऊँटनी एवं भेड़का दूध पी जानेपर और मरणाशौचका तथा जननाशौचका अन्न खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करे ।।
उपपातकिंश्चान्नं पतितान्नं तथैव च ।
शूद्रस्योच्छेषणं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
उपपातकी तथा पतितका अन्न और शूद्रका जूठा अन्न खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।
आकाशस्थं तु हस्तस्थमधःस्रस्तं तथैव च ।
परहस्तस्थितं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
आकाशमें लटकते हुए वृक्ष आदिके फलोंको, हाथपर रखे हुए, नीचे गिरे हुए तथा दूसरेके हाथपर पड़े हुए अन्नको खा लेनेपर भी चान्द्रायण-व्रत करे ।।
अथाग्रे दिधिषोरन्नं दिधिषूपपतेस्तथा ।
परिवेत्तूस्तथा चान्नं परिवित्तान्नमेव च ॥
कुण्डान्नं गोलकान्नं च देवलान्नं तथैव च ।
तथा पुरोहितस्यान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
बड़ी बहिनके अविवाहित रहते पहले विवाह कर लेनेवाली छोटी बहिनका तथा अपने भाईकी विधवा स्त्रीसे विवाह करनेवालेका एवं बड़े भाईके अविवाहित रहते विवाह करनेवाले छोटे भाईका और अविवाहित बड़े भाईका अन्न, कुण्डका, गोलकका और पुजारीका अन्न तथा पुरोहितका अन्न भोजन कर लेनेपर भी चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।।
सुरासवं विषं सर्पिर्लाक्षा लवणमेव च ।
तैलं चापि च विक्रीणन् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥
मदिरा, आसव, विष, घी, लाख, नमक और तेलकी बिक्री करनेवाले ब्राह्मणको भी चान्द्रायण-व्रत करना आवश्यक है ।। एकोद्दिष्टं तु यो भुङ्क्ते जनमध्यगतोऽपि यः । भिन्नभाण्डेषु यो भुङ्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।। जो द्विज एकोद्दिष्ट श्राद्धका अन्न खाता है और अधिक मनुष्योंकी भीड़में भोजन करता है तथा फूटे बर्तनोंमें खाता है, उसे चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।। यो भुङ्क्तेऽनुपनीतेन यो भुङ्क्ते च स्त्रिया सह । कन्यया सह यो भुङ्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।। जो उपनयन-संस्कारसे रहित बालक, कन्या और स्त्रीके साथ (एक पात्रमें) भोजन करता है, वह ब्राह्मण चान्द्रायण-व्रत करे ।। उच्छिष्टं स्थापयेद् विप्रो यो मोहाद् भोजनान्तरे । दद्याद् वा यदि वा मोहाद् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।। जो मोहवश अपना जूठा दूसरेके भोजनमें मिला देता है अथवा मोहके कारण दूसरेको देता है, उस ब्राह्मणको भी चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।। तुम्बकोशातकं चैव पलाण्डुं गृञ्जनं तथा । छत्राकं लशुनं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।। यदि द्विज तुम्बा और जिसमें केश पड़ा हो, ऐसा अन्न तथा प्याज, गाजर, छत्राक (कुकुरमुत्ते) और लहसुनको खा ले तो उसे चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।। उदक्यया शुना वापि चाण्डालैर्वा द्विजोत्तमः । दृष्टमन्नं तु भुञ्जानो द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।। यदि ब्राह्मण रजस्वला स्त्री, कुत्ते अथवा चाण्डालके द्वारा देखा हुआ अन्न खा ले तो उस ब्राह्मणको चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।। एतत् पुरा विशुद्धयर्थमृषिभिश्चरितं व्रतम् । पावनं सर्वभूतानां पुण्यं पाण्डव चोदितम् ।। पाण्डुनन्दन! पूर्वकालमें ऋषियोंने आत्मशुद्धिके लिये इस व्रतका आचरण किया था, यह सब प्राणियोंको पवित्र करनेवाला और पुण्यरूप बताया गया है ।। यथोक्तमेतद् यः कुर्याद् द्विजः पापप्रणाशनम् । स दिवं याति पूतात्मा निर्मलादित्यसंनिभः ।। जो द्विज इस पूर्वोक्त पापनाशक व्रतका अनुष्ठान करता है, वह पवित्रात्मा तथा निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी होकर स्वर्गलोकको प्राप्त होता है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)