भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2199, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2199

श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! इस महान् पुण्यदायक और परम धर्मरूपी अमृतका वर्णन सुनो। यह धर्मपरायण अग्निहोत्री ब्राह्मणोंको भवसागरसे पार कर देता है।। ब्रह्मत्वेनासृजं लोकानहमादौ महाद्युते।
सृष्टोऽग्निर्मुखतः पूर्वं लोकानां हितकाम्यया।।
महातेजस्वी महाराज! मैंने सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्मस्वरूपसे सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की और लोगोंकी भलाईके लिये अपने मुखसे सर्वप्रथम अग्निको प्रकट किया।।
यस्मादग्रे स भूतानां सर्वेषां निर्मितो मया।
तस्मादग्नीत्यभिहितः पुराणज्ञैर्मनीषिभिः।।
इस प्रकार अग्नि-तत्त्व मेरे द्वारा सब भूतोंके पहले उत्पन्न किया गया है, इसलिये पुराणोंके ज्ञाता मनीषी विद्वान् उसे अग्नि कहते हैं।।
यस्मात् तु सर्वकृत्येषु पूर्वमस्मै प्रदीयते।
आहुतिर्दीप्यमानाय तस्मादग्नीति कथ्यते।।
समस्त कार्योंमें सबसे आगे प्रज्वलित आगमें ही आहुति दी जाती है, इसलिये यह अग्नि कहा जाता है।।
यस्माच्च तु नयत्यग्रां गतिं विप्रान् सुपूजितः।
तस्माच्च नयनाद् राजन् देवेष्वग्नीति कथ्यते।।
राजन्! यह भलीभाँति पूजित होनेपर ब्राह्मणोंको अग्र्यगति (परमपद)-की प्राप्ति कराता है, इसलिये भी देवताओंमें अग्निके नामसे विख्यात है।।
यस्माच्च दुर्हुतः सोऽयमलं भक्षयितुं क्षणात्।
यजमानं नरश्रेष्ठ क्रव्यादोऽग्निस्ततः स्मृतः।।
सर्वभूतात्मको राजन् देवानामेष वै मुखम्।
नरोत्तम! यदि इसमें विधिका उल्लङ्घन करके हवन किया जाय तो यह एक क्षणमें ही यजमानको खा जानेकी शक्ति रखता है, इसलिये अग्निको क्रव्याद कहा गया है। राजन्! यह अग्नि सम्पूर्ण भूतोंका स्वरूप और देवताओंका मुख है।।
तेन सप्तर्षयः सिद्धाः संयतेन्द्रियबुद्धयः।
गता ह्यमरसायुज्यं ते ह्यग्न्यर्चनतत्पराः।।
अतः इन्द्रियों और मन-बुद्धिपर संयम रखनेवाले सिद्ध सप्तर्षिगण अग्निकी आराधनामें तत्पर रहनेके कारण ही देवताओंके स्वरूपको प्राप्त हुए हैं।।
अग्निहोत्रप्रकारं च शृणु राजन् समाहितः।
त्रयाणां गुणनामानि वह्नीनामुच्यते मया।।
राजन्! अब एकाग्रचित्त होकर अग्निहोत्रका प्रकार सुनो। अब मैं तीनों अग्नियोंके गुणके अनुसार नाम बता रहा हूँ।।
गृहाणां हि पतित्वं हि गृहपत्यमिति स्मृतम्।