भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2200, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2200

गृहपत्यं तु यस्यासीत् तत् तस्माद् गार्हपत्यता ।। गृहोंका आधिपत्य ही गृहपत्य माना गया है। यह गृहपत्य जिस अग्निमें प्रतिष्ठित है, वही 'गार्हपत्य अग्नि' के नामसे प्रसिद्ध है ।। यजमानं तु यस्मात् तु दक्षिणां तु गतिं नयेत् । दक्षिणाग्निं तमाहुस्ते दक्षिणायतनं द्विजाः ।। जो अग्नि यजमानको दक्षिण मार्गसे स्वर्गमें ले जाता है, उस दक्षिणमें रहनेवाले अग्निको ब्राह्मणलोग 'दक्षिणाग्नि' कहते हैं ।। आहुतिः सर्वमाख्याति हव्यं वै वहनं स्मृतम् । सर्वहव्यवहो वह्निर्गतश्चाहवनीयताम् ।। 'आहुति' शब्द सर्वका वाचक है और हवन नाम ही है हव्यका। सब प्रकारके हव्यको स्वीकार करनेवाला वह्नि 'आहवनीय अग्नि' कहलाता है ।। ब्रह्मा च गार्हपत्योऽग्निस्तस्मिन्नेव हि सोऽभवत् । दक्षिणाग्निस्त्वयं रुद्रः क्रोधात्मा चण्ड एव सः ।। गार्हपत्य अग्नि ब्रह्माका स्वरूप है, क्योंकि ब्रह्माजीसे ही उसका प्रादुर्भाव हुआ है और यह दक्षिणाग्नि रुद्रस्वरूप है, क्योंकि वह क्रोधरूप और प्रचण्ड है ।। अहमाहवनीयोऽग्निराहोमाद् यस्य वै मुखे । होमके आरम्भसे लेकर अन्ततक जिसके मुखमें आहुति डाली जाती है, वह आहवनीय अग्नि स्वयं मैं हूँ ।। पृथिवीमन्तरिक्षं च दिवमृषिगणैः सह । जयत्याहवनीयं यो जुहुयाद् भक्तिमान् नरः ।। जो मनुष्य भक्तियुक्त चित्तसे प्रतिदिन आहवनीय अग्निमें हवन करता है, वह पृथ्‍वी, अन्तरिक्ष और ऋषियों-सहित स्वर्गलोकपर भी अधिकार प्राप्त कर लेता है ।। आभिमुख्येन होमस्तु यस्य यज्ञेषु वर्तते । तेनाप्याहवनीयत्वं गतो वह्निर्महाद्युतिः ।। यज्ञोंमें सब ओरसे अग्निके मुखमें हवन किया जाता है, इसलिये वह अत्यन्त कान्तिमान् अग्नि 'आहवनीय' संज्ञाको प्राप्त होता है ।। आहोमादग्निहोत्रेषु यज्ञैर्वा यत्र सर्वशः । यस्मात् तस्मात् प्रवर्तन्ते ततो ह्याहवनीयता ।। अग्निहोत्र अथवा अन्यान्य यज्ञोंमें होमके आरम्भसे ही अग्निके भीतर सब प्रकारसे आहुति डाली जाती है, इसलिये भी उसे आहवनीय कहते हैं ।। आध्यात्मिकं चाधिदैवमाधिभौतिकमेव च । एतत् तापत्रयं प्रोक्तमात्मवद्भिर्र्नराधिप ।।