भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2201, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2201

नरेश्वर! आत्मवेत्ता विद्वानोंने आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—ये तीन प्रकारके दुःख बतलाये हैं ।।

यस्माद् वै त्रायते दुःखाद् यजमानं हुतोऽनलः ।
तस्मात् तु विधिवत् प्रोक्तमग्निहोत्रमिति श्रुतौ ।।
विधिवत् होम करनेपर अग्नि इन तीनों प्रकारके दुःखोंसे यजमानका त्राण करता है, इसलिये उस कर्मको वेदमें अग्निहोत्र नाम दिया गया है ।।

तदग्निहोत्रं सृष्टं वै ब्राह्मणा लोककर्तृणा ।
वेदाश्चाप्यग्निहोत्रं तु जज्ञिरे स्वयमेव तु ।।
विश्वविधाता ब्रह्माजीने ही सबसे पहले अग्निहोत्रको प्रकट किया। वेद और अग्निहोत्र स्वतः उत्पन्न हुए हैं ।।

अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ।
रतिपुत्रफला दारा दत्तभुक्तफलं धनम् ।।
वेदाध्ययनका फल अग्निहोत्र है (अर्थात् वेद पढ़कर जिसने अग्निहोत्र नहीं किया, उसका वह अध्ययन निष्फल है)। शास्त्रज्ञानका फल शील और सदाचार है, स्त्रीका फल रति और पुत्र है तथा धनकी सफलता दान और उपभोग करनेमें है ।।

त्रिवेदमन्त्रसंयोगादग्निहोत्रं प्रवर्तते ।
ऋग्यजुः सामभिः पुण्यैः स्थाप्यते सूत्रसंयुतैः ।।
तीनों वेदोंके मन्त्रोंके संयोगसे अग्निहोत्रकी प्रवृत्ति होती है। ऋक्, यजुः और सामवेदके पवित्र मन्त्रों तथा मीमांसासूत्रोंके द्वारा अग्निहोत्र-कर्मका प्रतिपादन किया जाता है ।।

वसन्ते ब्राह्मणस्य स्यादाधेयोऽग्निर्नराधिप ।
वसन्तो ब्राह्मणो ज्ञेयो वेदयोनिः स उच्यते ।।
नरेश्वर! वसन्त-ऋतुको ब्राह्मणका स्वरूप समझना चाहिये तथा वह वेदकी योनिरूप है, इसलिये ब्राह्मणको वसन्त-ऋतुमें अग्निकी स्थापना करनी चाहिये ।।

अग्न्याधेयं तु येनाथ वसन्ते क्रियतेऽनघ ।
तस्य श्रीर्ब्रह्मवृद्धिश्च ब्राह्मणस्य विवर्धते ।।
निष्पाप! जो वसन्त-ऋतुमें अग्न्याधान करता है, उस ब्राह्मणकी श्रीवृद्धि होती है तथा उसका वैदिक ज्ञान भी बढ़ता है ।।

क्षत्रियस्याग्निराधेयो ग्रीष्मे श्रेष्ठः स वै नृप ।
येनाधानं तु वै ग्रीष्मे क्रियते तस्य वर्धते ।
श्रीः प्रजाः पशवश्चैव वित्तं तेजो बलं यशः ।।
राजन्! क्षत्रियके लिये ग्रीष्म-ऋतुमें अग्न्याधान करना श्रेष्ठ माना गया है। जो क्षत्रिय ग्रीष्म-ऋतुमें अग्नि-स्थापना करता है, उसकी सम्पत्ति, प्रजा, पशु, धन, तेज, बल और