भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2196, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2196

सदाचार, अहिंसा, सत्य, शक्तिके अनुसार दान तथा यम और नियमोंका पालन—ये मुख्य धर्म हैं ॥

वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् ।
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टिपर्यन्त सब संस्कार वेदोक्त पवित्र विधियों और मन्त्रोंके अनुसार कराना चाहिये; क्योंकि संस्कार इहलोक और परलोकमें भी पवित्र करनेवाला है ॥

गर्भहोमैर्जातकर्मनामचौलोपनायनैः ।
स्वाध्यायैस्तद् व्रतैश्चैव विवाहस्नातकव्रतैः ॥
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥
गर्भाधान-संस्कारमें किये जानेवाले हवनके द्वारा और जातकर्म, नामकरण, चूड़ाकरण, यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन, वेदोक्त व्रतोंके पालन, स्नातकके पालनेयोग्य व्रत, विवाह, पञ्चमहायज्ञोंके अनुष्ठान तथा अन्यान्य यज्ञोंके द्वारा इस शरीरको परब्रह्मकी प्राप्तिके योग्य बनाया जाता है ॥

धर्मार्थौ यदि न स्यातां शुश्रूषा वापि तद्विधा ।
विद्या तस्मिन् न वक्तव्या शुभं बीजमिवोषरे ॥
जिससे न धर्मका लाभ होता हो, न अर्थका तथा विद्याप्राप्तिके अनुकूल जो सेवा भी नहीं करता हो, उस शिष्यको विद्या नहीं पढ़नी चाहिये, ठीक उसी तरह जैसे ऊसर खेतमें उत्तम बीज नहीं बोया जाता ॥

लौकिकं वैदिकं वापि तथाऽऽध्यात्मिकमेव वा ।
यस्माज्ज्ञानमिदं प्राप्तं तं पूर्वमभिवादयेत् ॥
जिस पुरुषसे लौकिक, वैदिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ हो, उस गुरुको पहले प्रणाम करना चाहिये ॥

सव्येन सव्यं संगृह्य दक्षिणेन तु दक्षिणम् ।
न कुर्यादेकहस्तेन गुरोः पादाभिवादनम् ॥
अपने दाहिने हाथसे गुरुका दाहिना चरण और बायें हाथसे उनका बायाँ चरण पकड़कर प्रणाम करना चाहिये। गुरुको एक हाथसे कभी प्रणाम नहीं करना चाहिये ॥

निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि ।
अध्यापयति चैवैनं स विप्रो गुरुरुच्यते ॥
जो गर्भाधान आदि सब संस्कार विधिवत् कराता है और वेद पढ़ाता है, वह ब्राह्मण गुरु कहलाता है ॥

कृत्वोपनयनं वेदान् योऽध्यापयति नित्यशः ।
सकल्पान् सरहस्यांश्च स चोपाध्याय उच्यते ॥

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