महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2197, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो उपनयन-संस्कार कराकर कल्प और रहस्यों-सहित वेदोंका नित्य अध्ययन कराता है, उसे उपाध्याय कहते हैं ।। साङ्गांश्च वेदानध्याप्य शिक्षयित्वा व्रतानि च । विवृणोति च मन्त्रार्थानाचार्यः सोऽभिधीयते ।। जो षडङ्गयुक्त वेदोंको पढ़ाकर वैदिक व्रतोंकी शिक्षा देता है और मन्त्रार्थोंकी व्याख्या करता है, वह आचार्य कहलाता है ।। उपाध्यायाद् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता । पितुः शतगुणं माता गौरवेणातिरिच्यते ।। गौरवमें दस उपाध्यायोंसे बढ़कर एक आचार्य, सौ आचार्योंसे बढ़कर पिता और सौ पितासे भी बढ़कर माता है ।। एतेषामपि सर्वेषां गरीयान् ज्ञानदो गुरुः । गुरोः परतरं किंचिन्न भूतं न भविष्यति ।। किंतु जो ज्ञान देनेवाले गुरु हैं, वे इन सबकी अपेक्षा अत्यन्त श्रेष्ठ हैं। गुरुसे बढ़कर न कोई हुआ, न होगा ।। तस्मात् तेषां वशे तिष्ठेच्छुश्रूषापरमो भवेत् । अवमानाद्धि तेषां तु नरकं स्यान्न संशयः ।। इसलिये मनुष्यको उपर्युक्त गुरुजनोंके अधीन रहकर उनकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहना चाहिये। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि गुरुजनोंके अपमानसे नरकमें गिरना पड़ता है ।। हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान् विद्याहीनान् वयोऽधिकान् । रूपद्रविणहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत् ।। जो लोग किसी अंगसे हीन हों, जिनका कोई अंग अधिक हो, जो विद्यासे हीन, अवस्थाके बूढ़े, रूप और धनसे रहित तथा जातिसे भी नीच हों, उनपर आक्षेप नहीं करना चाहिये ।। शपता यत् कृतं पुण्यं शप्यमानं तु गच्छति । शप्यमानस्य यत् पापं शपन्तमनुगच्छति ।। क्योंकि आक्षेप करनेवाले मनुष्यका पुण्य, जिसका आक्षेप किया जाता है, उसके पास चला जाता है और उसका पाप आक्षेप करनेवालेके पास चला आता है ।। नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं विवर्जयेत् ।। नास्तिकता, वेदोंकी निन्दा, देवताओंपर दोषारोपण, द्वेष, दम्भ, अभिमान, क्रोध तथा कठोरता—इनका परित्याग कर देना चाहिये ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)