महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2203, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्णाक्षरपदार्थानां संधिलिङ्गं प्रकीर्तितम् ।
नामधातुविवेकर्थ पुरा व्याकरणं स्मृतम् ॥
वर्ण, अक्षर और पदोंके अर्थका, संधि और लिङ्गका तथा नाम और धातुका विवेक होनेके लिये पूर्वकालमें व्याकरणशास्त्रकी रचना हुई है ।।
यूपवेद्यध्वरार्थं तु प्रोक्षणश्रपणाय तु ।
यज्ञदैवतयोगर्थं शिक्षाज्ञानं प्रकल्पितम् ॥
यूप, वेदी और यज्ञका स्वरूप जाननेके लिये, प्रोक्षण और श्रपण (चरु पकाना) आदिकी इतिकर्तव्यताको समझनेके लिये तथा यज्ञ और देवताके सम्बन्धका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये शिक्षा नामक वेदांगकी रचना हुई है ।।
यज्ञपात्रपवित्रार्थं द्रव्यसम्भारणाय च ।
सर्वयज्ञविकल्पाय पुरा कल्पं प्रकीर्तितम् ॥
यज्ञके पात्रोंकी शुद्धि, यज्ञसम्बन्धी सामग्रियोंके संग्रह तथा समस्त यज्ञोंके वैकल्पिक विधानोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें कल्पशास्त्रका निर्माण किया गया है ।।
नामधातुविकल्पानां तत्त्वार्थनियमाय च ।
सर्ववेदनिरुक्तानां निरुक्तमृषिभिः कृतम् ॥
सम्पूर्ण वेदोंमें प्रयुक्त नाम, धातु और विकल्पोंके तात्त्विक अर्थका निश्चय करनेके लिये ऋषियोंने निरुक्तकी रचना की है ।।
वेद्यर्थं पृथिवी सृष्टा सम्भारार्थं तथैव च ।
इध्मार्थमथ यूपार्थं ब्रह्मा चक्रे वनस्पतिम् ॥
यज्ञकी वेदी बनाने तथा अन्य सामग्रियोंको धारण करनेके लिये ब्रह्माजीने पृथ्वीकी सृष्टि की है। समिधा और यूप बनानेके लिये वनस्पतियोंकी रचना की है ।।
गावो यज्ञार्थमुत्पन्ना दक्षिणार्थं तथैव च ।
सुवर्णं रजतं चैव पात्रकुम्भार्थमेव च ॥
गौएँ यज्ञ और दक्षिणाके लिये उत्पन्न हुई हैं, क्योंकि गोघृत और गोदक्षिणाके बिना यज्ञ सम्पन्न नहीं होता। सुवर्ण और चाँदी—ये यज्ञके पात्र और कलश बनानेका काम लेनेके लिये पैदा हुए हैं ।।
दर्भाः संस्तरणार्थं तु रक्षसां रक्षणाय च ।
पूजनार्थं द्विजाः सृष्टास्तारका दिवि देवताः ॥
कुशोंकी उत्पत्ति हवनकुण्डके चारों ओर फैलाने और राक्षसोंसे यज्ञकी रक्षा करनेके लिये हुई है। पूजन करनेके लिये ब्राह्मणोंको, नक्षत्रोंको और स्वर्गके देवताओंको उत्पन्न किया गया है ।।
क्षत्रियाः रक्षणार्थं तु वैश्या वार्त्तानिमित्ततः ।
शुश्रूषार्थं त्रयाणां वै शूद्राः सृष्टाः स्वयम्भुवा ॥