महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2204, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसबकी रक्षाके लिये क्षत्रिय-जातिकी सृष्टि की गयी है। कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य आदि जीविकाका साधन जुटानेके लिये वैश्योंकी उत्पत्ति हुई है और तीनों वर्णोंकी सेवाके लिये ब्रह्माजीने शूद्रोंको उत्पन्न किया है॥
यथोक्तमग्निहोत्राणां शुश्रूषन्ति च ये द्विजाः।
तैर्दत्तं सहुतं चेष्टं दत्तमध्यापितं भवेत्॥
जो द्विज विधिपूर्वक अग्निहोत्रका सेवन करते हैं, उनके द्वारा दान, होम, यज्ञ और अध्यापन—ये समस्त कर्म पूर्ण हो जाते हैं॥
एवमिष्टं च पूर्तं च यद् विप्रैः क्रियते नृप।
तत् सर्वं सम्यगाहृत्य चादित्ये स्थापयाम्यहम्॥
राजन्! इसी प्रकार ब्राह्मणोंके द्वारा जो यज्ञ करने, बगीचे लगाने और कुएँ खुदवाने आदिके कार्य होते हैं, उन सबके पुण्यको लेकर मैं सूर्यमण्डलमें स्थापित कर देता हूँ॥
मया स्थापितमादित्ये लोकस्य सुकृतं हि तत्।
धारयेद् यत् सहस्रांशुः सुकृतं ह्यग्निहोत्रिणाम्॥
मेरे द्वारा आदित्यमें स्थापित किये हुए संसारके पुण्य और अग्निहोत्रियोंके सुकृतको सहस्रों किरणोंवाले सूर्यदेव धारण किये रहते हैं॥
तस्मादप्रोषितैर्नित्यमग्निहोत्रं द्विजातिभिः।
होतव्यं विधिवद् राजन्नूर्ध्वमिच्छन्ति ये गतिम्॥
इसलिये राजन्! जो द्विज परदेशमें न रहते हों और ऊर्ध्वगतिको प्राप्त करना चाहते हों, उन्हें प्रतिदिन विधिपूर्वक अग्निहोत्र करना चाहिये॥
आत्मवन्नावमन्तव्यमग्निहोत्रं युधिष्ठिर।
न त्याज्यं क्षणमप्येतदग्निहोत्रं युधिष्ठिर॥
महाराज युधिष्ठिर! अग्निहोत्रको अपने आत्माके समान समझकर कभी भी उसका अपमान या एक क्षणके लिये भी त्याग नहीं करना चाहिये॥
बालाहिताग्नयो ये च शूद्रान्नाद् विरताः सदा।
क्रोधलोभविनिर्मुक्ताः प्रातःस्नानपरायणाः।
यथोक्तमग्निहोत्रं वै जुह्वते विजितेन्द्रियाः॥
आतिथेयाः सदा सौम्या द्विकालं मत्परायणाः।
ते यान्त्यपुनरावृत्तिं भित्त्वा चादित्यमण्डलम्॥
जो बाल्यकालसे ही अग्निहोत्रका सेवन करते और शूद्रके अन्नसे सदा दूर रहते हैं, जो क्रोध और लोभसे रहित हैं, जो प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके जितेन्द्रियभावसे विधिवत् अग्निहोत्रका अनुष्ठान करते हैं, सदा अतिथिकी सेवामें लगे रहते हैं तथा शान्तभावसे रहकर दोनों समय मेरे परायण होकर मेरा ध्यान करते हैं, वे सूर्यमण्डलको भेदकर मेरे परम धामको प्राप्त होते हैं, जहाँसे पुनः इस संसारमें नहीं लौटना पड़ता॥