महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2210, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंचान्द्रायण-व्रतके आचरणसे मनुष्यके समस्त पाप सूखे काठकी भाँति तुरंत जलकर खाक हो जाते हैं ।।
ब्रह्महत्या च गोहत्या सुवर्णस्तेन्यमेव च ।
भ्रूणहत्या सुरापानं गुरोर्दारव्यतिक्रमः ॥
एवमन्यानि पापानि पातकीयानि यानि च ।
चान्द्रायणेन नश्यन्ति वायुना पांसवो यथा ॥
ब्रह्महत्या, गोहत्या, सुवर्णकी चोरी, भ्रूणहत्या, मदिरापान और गुरु-स्त्री-गमन तथा और भी जितने पाप या पातक हैं, वे चान्द्रायण-व्रतसे उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे हवाके वेगसे धूल उड़ जाती है ।।
अनिर्देशाया गोः क्षीरमौष्ट्रमाविकमेव च ।
मृतसूतकयोश्चान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
जिस गौको ब्याये हुए दस दिन भी न हुए हों, उसका दूध तथा ऊँटनी एवं भेड़का दूध पी जानेपर और मरणाशौचका तथा जननाशौचका अन्न खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करे ।।
उपपातकिंश्चान्नं पतितान्नं तथैव च ।
शूद्रस्योच्छेषणं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
उपपातकी तथा पतितका अन्न और शूद्रका जूठा अन्न खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।
आकाशस्थं तु हस्तस्थमधःस्रस्तं तथैव च ।
परहस्तस्थितं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
आकाशमें लटकते हुए वृक्ष आदिके फलोंको, हाथपर रखे हुए, नीचे गिरे हुए तथा दूसरेके हाथपर पड़े हुए अन्नको खा लेनेपर भी चान्द्रायण-व्रत करे ।।
अथाग्रे दिधिषोरन्नं दिधिषूपपतेस्तथा ।
परिवेत्तूस्तथा चान्नं परिवित्तान्नमेव च ॥
कुण्डान्नं गोलकान्नं च देवलान्नं तथैव च ।
तथा पुरोहितस्यान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
बड़ी बहिनके अविवाहित रहते पहले विवाह कर लेनेवाली छोटी बहिनका तथा अपने भाईकी विधवा स्त्रीसे विवाह करनेवालेका एवं बड़े भाईके अविवाहित रहते विवाह करनेवाले छोटे भाईका और अविवाहित बड़े भाईका अन्न, कुण्डका, गोलकका और पुजारीका अन्न तथा पुरोहितका अन्न भोजन कर लेनेपर भी चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।।
सुरासवं विषं सर्पिर्लाक्षा लवणमेव च ।
तैलं चापि च विक्रीणन् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥