भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2209, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2209

विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो दद्यादन्नं यथाक्रमम् ॥
फिर क्रमशः ब्रह्मा, अग्नि, सोम, वरुण तथा विश्वेदेवोंको एक-एक ग्रास दे ॥
अवशिष्टमथैकं तु वक्त्रमात्रं प्रकल्पयेत् ।
अन्तमें जो एक ग्रास बच जाय, उसको ऐसा बना ले, जिससे वह सुगमतापूर्वक मुँहमें आ सके ॥
अङ्गुल्यग्रे स्थितं पिण्डं गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् ।
अङ्गुलीभिस्त्रिभिः पिण्डं प्राश्नीयात् प्राङ्मुखः शुचिः ॥
फिर पवित्र भावसे पूर्वाभिमुख होकर उस ग्रासको दाहिने हाथकी अंगुलियोंके अग्रभागपर रखकर गायत्री-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे और तीन अंगुलियोंसे ही उसे मुँहमें डालकर खा जाय ॥
यथा च वर्धते सोमो ह्रसते च यथा पुनः ।
तथा पिण्डाश्च वर्धन्ते ह्रसन्ते च दिने दिने ॥
जैसे चन्द्रमा शुक्लपक्षमें प्रतिदिन बढ़ता है और कृष्णपक्षमें प्रतिदिन घटता रहता है, उसी प्रकार ग्रासोंकी मात्रा भी शुक्लपक्षमें बढ़ती है और कृष्णपक्षमें घटती रहती है ॥*
त्रिकालं स्नानमस्योक्तं द्विकालमथवा सकृत् ।
ब्रह्मचारी सदा वापि न च वस्त्रं प्रपीडयेत् ॥
चान्द्रायण-व्रत करनेवालेके लिये प्रतिदिन तीन समय, दो समय अथवा एक समय भी स्नान करनेका विधान मिलता है। उसे सदा ब्रह्मचारी रहना चाहिये और तर्पणके पूर्व वस्त्र नहीं निचोड़ना चाहिये ॥
स्थाने न दिवसं तिष्ठेद् रात्रौ वीरासनं व्रजेत् ।
भवेत् स्थण्डिलशायी वाप्यथवा वृक्षमूलिकः ॥
दिनमें एक जगह खड़ा न रहे, रातको वीरासनसे बैठे अथवा वेदीपर या वृक्षकी जड़पर सो रहे ॥
वल्कलं यदि वा क्षौमं शाणं कार्पासिकं तथा ।
आच्छादनं भवेत् तस्य वस्त्रार्थं पाण्डुनन्दन ॥
पाण्डुनन्दन! उसे शरीर ढकनेके लिये वल्कल, रेशम, सन अथवा कपासका वस्त्र धारण करना चाहिये ॥
एवं चान्द्रायणे पूर्णे मासस्यान्ते प्रयत्नवान् ।
ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या दद्याच्चैव च दक्षिणाम् ॥
इस प्रकार एक महीने बाद चान्द्रायणव्रत पूर्ण होनेपर उद्योग करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा दे ॥
चान्द्रायणेन चीर्णेन यत् कृतं तेन दुष्कृतम् ।
तत् सर्वं तत्क्षणादेव भस्मीभवति काष्ठवत् ॥