महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2221, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त]
युधिष्ठिर उवाच
देव किं फलमाख्यातं विषुवेष्वमरेश्वर । सूर्येन्दूपप्लवे चैव वक्तुमर्हसि तत् फलम् ॥ युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! देवेश्वर! विषुव-योगमें तथा सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणके समय दान देनेसे किस फलकी प्राप्ति बतायी गयी है, यह बतलानेकी कृपा करें ॥
श्रीभगवानुवाच
शृणुष्व राजन् विषुवे सोमार्कग्रहणेषु च । व्यतीपातेऽयने चैव दानं स्यादक्षयं फलम् ॥ श्रीभगवान्ने कहा—राजन्! विषुवयोगमें, सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणके समय, व्यतीपातयोगमें तथा उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन जो दान दिया जाता है, वह अक्षय फल देनेवाला होता है। इस विषयका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ राजनयनयोर्मध्ये विषुवं सम्प्रचक्षते । समे रात्रिदिने तत्र संध्यायां विषुवे नृप ॥ ब्रह्माहं शङ्करश्चापि तिष्ठामः सहिताः सकृत् । क्रियाकरणकार्याणामेकीभावत्वकारणात् ॥ महाराज युधिष्ठिर! उत्तरायण और दक्षिणायनके मध्य भागमें जब कि रात और दिन बराबर होते हैं, वह समय 'विषुवयोग' के नामसे पुकारा जाता है। उस दिन संध्याके समय मैं, ब्रह्मा और महादेवजी क्रिया, करण और कार्योंकी एकतापर विचार करनेके लिये एक बार एकत्रित होते हैं ॥ अस्माकमेकीभूतानां निष्कलं परमं पदम् । तन्मुहूर्तं परं पुण्यं राजन् विषुवसंज्ञितम् ॥ नरेश्वर! जिस मुहूर्तमें हम लोगोंका समागम होता है, वह कलारहित परम पद है। वह मुहूर्त परम पवित्र और विषुवपर्वके नामसे प्रसिद्ध है ॥ तदेवाद्यक्षरं ब्रह्म परं ब्रह्मेति कीर्तितम् । तस्मिन् मुहूर्ते सर्वे तु चिन्तयन्ति परं पदम् ॥ उसे अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म भी कहते हैं। उस मुहूर्तमें सब लोग परम पदका चिन्तन करते हैं ॥ देवाश्च वसवो रुद्राः पितरश्चाश्विनौ तथा । साध्याश्च विश्वे गन्धर्वाः सिद्धा ब्रह्मर्षयस्तथा ॥ सोमादयो ग्रहाश्चैव सरितः सागरास्तथा ।