महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2222, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमरुतोऽप्सरसो नागा यक्षराक्षसगुह्यकाः ।। एते चान्ये च राजेन्द्र विषुवे संयतेन्द्रियाः । सोपवासाः प्रयत्नेन भवन्ति ध्यानतत्पराः ।। राजेन्द्र! देवता, वसु, रुद्र, पितर, अश्विनीकुमार, साध्यगण, विश्वेदेव, गन्धर्व, सिद्ध, ब्रह्मर्षि, सोम आदि ग्रह, नदियाँ, समुद्र, मरुत्, अप्सरा, नाग, यक्ष, राक्षस और गुह्यक—ये तथा दूसरे देवता भी विषुवपर्वमें इन्द्रिय-संयमपूर्वक उपवास करते हैं और प्रयत्नपूर्वक परमात्माके ध्यानमें संलग्न होते हैं ।। अन्नं गावस्तिलान् भूमिं कन्यादानं तथैव च । गृहमायतनं धान्यं वाहनं शयनं तथा ।। यच्चान्यच्च मया प्रोक्तं तत् प्रयच्छ युधिष्ठिर । इसलिये युधिष्ठिर! तुम अन्न, गौ, तिल, भूमि, कन्या, घर, विश्रामस्थान, धान्य, वाहन, शय्या तथा और जो वस्तुएँ मेरे द्वारा दानके योग बतलायी गयी हैं, उन सबका विषुवपर्वमें दान करो ।। दीयते विषुवेष्वेवं श्रोत्रियेभ्यो विशेषतः ।। तस्य दानस्य कौन्तेय क्षयं नैवोपपद्यते । वर्धतेऽहरहः पुण्यं तद् दानं कोटिसम्मितम् ।। कुन्तीनन्दन! जो दान विषुवयोगमें विशेषतः श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दिया जाता है, उस दानका कभी नाश नहीं होता। उस दानका पुण्य प्रतिदिन बढ़ते-बढ़ते करोड़ गुना हो जाता है ।। चन्द्रसूर्यग्रहे व्योम्नि मम वा शङ्करस्य वा । गायत्रीं मामिकां वापि जपेद् यः शङ्करस्य वा ।। शङ्खतूर्यस्वनैश्चैव कांस्यघण्टास्वनैरपि । कारयेत् तु ध्वनिं भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ।। आकाशमें जब चन्द्रग्रहण अथवा सूर्यग्रहण लगा हो, उस समय जो मेरी अथवा भगवान् शङ्करकी पूजा करता हुआ मेरी या शङ्करकी गायत्रीका जप करता है तथा भक्तिके साथ शंख, तूर्य, झाँझ और घंटा बजाकर उनकी ध्वनि करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो ।। गान्धर्वैर्होमजप्यैस्तु जप्तैरुत्कृष्टनामभिः । दुर्बलोऽपि भवेद् राहुः सोमश्च बलवान् भवेत् ।। मेरे सामने गीत गाने, होम और जप करने तथा मेरे उत्तम नामोंका कीर्तन करनेसे राहु दुर्बल और चन्द्रमा बलवान् होते हैं ।। सूर्येन्दूपप्लवे चैव श्रोत्रियेभ्यः प्रदीयते । तत्सहस्रगुणं भूत्वा दातारमुपतिष्ठति ।।