भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2223, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2223

सूर्य और चन्द्रमाके ग्रहणकालमें श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको जो दान दिया जाता है, वह हजार गुना होकर दाताको मिलता है ।।
महापातकयुक्तोऽपि यद्यपि स्यान्नरोत्तमः ।
निष्पापस्तत्क्षणादेव तेन दानेन जायते ।।
महान् पातकी मनुष्य भी उस दानसे तत्काल पापरहित होकर पुरुषश्रेष्ठ हो जाता है ।।
चन्द्रसूर्यप्रकाशेन विमानेन विराजता ।
याति सोमपुरं रम्यं सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ।।
वह चन्द्रमा और सूर्यके प्रकाशसे प्रकाशित सुन्दर विमानपर बैठकर रमणीय चन्द्रलोकमें गमन करता है और वहाँ अप्सरागणोंसे उसकी सेवा की जाती है ।।
यावदृक्षाणि तिष्ठन्ति गगने शशिना सह ।
तावत् कालं स राजेन्द्र सोमलोके महीयते ।।
राजेन्द्र! जबतक आकाशमें चन्द्रमाके साथ तारे मौजूद रहते हैं, तबतक चन्द्रलोकमें वह सम्मानके साथ निवास करता है ।।
ततश्चापि च्युतः कालादिह लोके युधिष्ठिर ।
वेदवेदाङ्गविद् विप्रः कोटीधनपतिर्भवेत् ।।
युधिष्ठिर! फिर समयानुसार वहाँसे लौटनेपर इस संसारमें वह वेद-वेदांगोंका विद्वान् और करोड़पति ब्राह्मण होता है ।।

युधिष्ठिर उवाच
भगवंस्तव गायत्री जप्यते च कथं विभो ।
किं वा तस्य फलं देव ममाचक्ष्व सुरेश्वर ।।
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! विभो! आपकी गायत्रीका जप किस तरह किया जाता है? देवदेवेश्वर! उसका क्या फल होता है—यह बतानेकी कृपा कीजिये ।।

श्रीभगवानुवाच
द्वादश्यां विषुवं चैव चन्द्रसूर्यग्रहे तथा ।
अयने श्रवणे चैव व्यतीपाते तथैव च ।।
अश्वत्थदर्शने चैव तथा मद्दर्शनेऽपि च ।
जप्या तु मम गायत्री चाथवाष्टाक्षरं नृप ।
अर्जितं दुष्कृतं तस्य नाशयेन्नात्र संशयः ।।
श्रीभगवान्‌ने कहा— राजन्! द्वादशी तिथिको, विषुवपर्वमें, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय, उत्तरायण तथा दक्षिणायनके आरम्भके दिन, श्रवण-नक्षत्रमें तथा व्यतीपात योगमें पीपलका या मेरा दर्शन होनेपर मेरी गायत्रीका अथवा अष्टाक्षर मन्त्र (