महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2224, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनमो नारायणाय)-का जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यके पूर्वकृत् पापोंका निःसंदेह नाश हो जाता है ।।
युधिष्ठिर उवाच
अश्वत्थदर्शनं चैव किं त्वद्दर्शनसम्मितम् । एतत् कथय मे देव परं कौतूहलं हि मे ।। युधिष्ठिरने पूछा—देव! अब यह बतलाइये कि पीपलका दर्शन आपके दर्शनके समान क्यों माना जाता है। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ।।
श्रीभगवानुवाच
अहमश्वत्थरूपेण पालयामि जगत्त्रयम् । अश्वत्थो न स्थितो यत्र नाहं तत्र प्रतिष्ठितः ।। श्रीभगवान्ने कहा—राजन्! मैं ही पीपलके वृक्षके रूपमें रहकर तीनों लोकोंका पालन करता हूँ। जहाँ पीपलका वृक्ष नहीं है, वहाँ मेरा वास नहीं है ।। यत्राहं संस्थितो राजन्नश्वत्थश्चापि तिष्ठति । यस्त्वेनमर्चयेद् भक्त्या स मां साक्षात् समर्चति ।। राजन्! जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ पीपल भी रहता है। जो मनुष्य भक्तिभावसे पीपल-वृक्षकी पूजा करता है, वह साक्षात् मेरी ही पूजा करता है ।। यस्त्वेनं प्रहरेत् कोपान्मामेव प्रहरेत् तु सः । तस्मात् प्रदक्षिणं कुर्यान्न छिन्द्यादेनमन्वहम् ।। जो क्रोध करके पीपलपर प्रहार करता है, वह वास्तवमें मुझपर ही प्रहार करता है। इसलिये पीपलकी सदा प्रदक्षिणा करनी चाहिये, उसको काटना नहीं चाहिये ।। व्रतस्य पारणं तीर्थमार्जवं तीर्थमुच्यते । देवशुश्रूषणं तीर्थं गुरुशुश्रूषणं तथा ।। व्रतका पारण, सरलता, देवताओंकी सेवा और गुरुशुश्रूषा—ये सब तीर्थ कहे जाते हैं ।। पितृशुश्रूषणं तीर्थं मातृशुश्रूषणं तथा । दाराणां तोषणं तीर्थं गार्हस्थ्यं तीर्थमुच्यते ।। माता-पिताकी सेवा, स्त्रियोंको संतुष्ट रखना और गृहस्थ-धर्मका पालन करना—ये सब तीर्थ कहे गये हैं ।। आतिथेयः परं तीर्थं ब्रह्मतीर्थं सनातनम् । ब्रह्मचर्यं परं तीर्थं त्रेताग्निस्तीर्थमुच्यते ।। अतिथि-सेवामें लगे रहना परम तीर्थ है। वेदका अध्ययन सनातन तीर्थ है। ब्रह्मचर्यका पालन करना परम तीर्थ है। आहवनीयादि तीन प्रकारकी अग्नियाँ—ये तीर्थ कहे जाते हैं ।।