भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2225, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2225

मूलं धर्मं तु विज्ञाय मनस्तत्रावधार्यताम् ।
गच्छ तीर्थानि कौन्तेय धर्मो धर्मेण वर्धते ॥
कुन्तीनन्दन! इन सबका मूल है 'धर्म'—ऐसा जानकर इनमें मन लगाओ तथा तीर्थोंमें जाओ; क्योंकि धर्म करनेसे धर्मकी वृद्धि होती है ॥

द्विविधं तीर्थमित्याहुः स्थावरं जङ्गमं तथा ।
स्थावराज्जङ्गमं तीर्थं ततो ज्ञानपरिग्रहः ॥
दो प्रकारके तीर्थ बताये जाते हैं—स्थावर और जंगम। स्थावर तीर्थसे जंगम तीर्थ श्रेष्ठ है; क्योंकि उससे ज्ञानकी प्राप्ति होती है ॥

कर्मणापि विशुद्धस्य पुरुषस्येह भारत ।
हृदये सर्वतीर्थानि तीर्थभूतः स उच्यते ॥
भारत! इस लोकमें पुण्यकर्मके अनुष्ठानसे विशुद्ध हुए पुरुषके हृदयमें सब तीर्थ वास करते हैं, इसलिये वह तीर्थस्वरूप कहलाता है ॥

गुरुतीर्थं परं ज्ञानमतस्तीर्थं न विद्यते ।
ज्ञानतीर्थं परं तीर्थं ब्रह्मतीर्थं सनातनम् ॥
गुरुरूपी तीर्थसे परमात्माका ज्ञान प्राप्त होता है, इसलिये उससे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है। ज्ञानतीर्थ सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है और ब्रह्मतीर्थ सनातन है ॥

क्षमा तु परमं तीर्थं सर्वतीर्थेषु पाण्डव ।
क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ॥
पाण्डुनन्दन! समस्त तीर्थोंमें भी क्षमा सबसे बड़ा तीर्थ है। क्षमाशील मनुष्योंको इस लोक और परलोकमें भी सुख मिलता है ॥

मानितोऽमानितो वापि पूजितोऽपूजितोऽपि वा ।
आक्रुष्टस्तर्जितो वापि क्षमावांस्तीर्थमुच्यते ॥
कोई मान करे या अपमान, पूजा करे या तिरस्कार, अथवा गाली दे या डाँट बतावे, इन सभी परिस्थितियोंमें जो क्षमाशील बना रहता है, वह तीर्थ कहलाता है ॥

क्षमा यशः क्षमा दानं क्षमा यज्ञः क्षमा दमः ।
क्षमा हिंसा क्षमा धर्मः क्षमा चेन्द्रियनिग्रहः ॥
क्षमा ही यश, दान, यज्ञ और मनोनिग्रह है। अहिंसा, धर्म और इन्द्रियोंका संयम क्षमाके ही स्वरूप हैं ॥

क्षमा दया क्षमा यज्ञः क्षमयैव धृतं जगत् ।
क्षमावान् ब्राह्मणो देवः क्षमावान् ब्राह्मणो वरः ॥
क्षमा ही दया और क्षमा ही यज्ञ है। क्षमासे ही सारा जगत् टिका हुआ है; अतः जो ब्राह्मण क्षमावान् है, वह देवता कहलाता है, वही सबसे श्रेष्ठ है ॥

क्षमावान् प्राप्नुयात् स्वर्गं क्षमावानाप्नुयाद् यशः ।