भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2226, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2226

क्षमावान् प्राप्नुयान्मोक्षं तस्मात् साधुः स उच्यते ॥ क्षमाशील मनुष्यको स्वर्ग, यश और मोक्षकी प्राप्ति होती है; इसलिये क्षमावान् पुरुष साधु कहलाता है ॥ आत्मा नदी भारत पुण्यतीर्थ- मात्मा तीर्थं सर्वतीर्थप्रधानम् । आत्मा यज्ञः सततं मन्यते वै स्वर्गो मोक्षः सर्वमात्मन्यधीनम् ॥ राजन्! आत्मारूप नदी परम पावन तीर्थ है, यह सब तीर्थोंमें प्रधान है। आत्माको सदा यज्ञरूप माना गया है। स्वर्ग, मोक्ष—सब आत्माके ही अधीन हैं ॥ आचारनैर्मल्यमुपागतेन सत्यक्षमानिस्तुलशीतलेन । ज्ञानाम्बुना स्नाति हि नित्यमेवं किं तस्य भूयः सलिलेन तीर्थम् ॥ जो सदाचारके पालनसे अत्यन्त निर्मल हो गया है तथा सत्य और क्षमाके द्वारा जिसमें अतुलनीय शीतलता आ गयी है—ऐसे ज्ञानरूपी जलमें निरन्तर स्नान करनेवाले पुरुषको केवल पानीसे भरे हुए तीर्थकी क्या आवश्यकता है? ॥

युधिष्ठिर उवाच

भगवन् सर्वपापघ्नं प्रायश्चित्तमदुष्करम् । त्वद्भक्तस्य सुरश्रेष्ठ मम त्वं वक्तुमर्हसि ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**देवश्रेष्ठ भगवन्! मैं आपका भक्त हूँ। अब मुझे कोई ऐसा प्रायश्चित्त बतलाइये, जो करनेमें सरल और समस्त पापोंका नाश करनेवाला हो ॥

श्रीभगवानुवाच

रहस्यमिदमत्यर्थमश्राव्यं पापकर्मणाम् । अधार्मिकाणामश्राव्यं प्रायश्चित्तं ब्रवीमि ते ॥ **श्रीभगवान् बोले—**राजन्! मैं तुम्हें अत्यन्त गोपनीय प्रायश्चित्त बता रहा हूँ। यह अधर्ममें रुचि रखनेवाले पापाचारी मनुष्योंको सुनाने योग्य नहीं है ॥ पावनं ब्राह्मणं दृष्ट्वा मद्गतेनान्तरात्मना । नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्यभिवादनमाचरेत् ॥ किसी पवित्र ब्राह्मणको सामने देखनेपर सहसा मेरा स्मरण करे और ‘नमो ब्रह्मण्यदेवाय’ कहकर भगवद्-बुद्धिसे उन्हें प्रणाम करे ॥ प्रदक्षिणं च यः कुर्यात् पुनरष्टाक्षरेण तु । तेन तुष्टेन विप्रेण तत्पापं क्षपयाम्यहम् ॥