भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2227, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2227

इसके बाद अष्टाक्षर मन्त्रका जप करते हुए ब्राह्मणदेवताकी परिक्रमा करे। ऐसा करनेसे ब्राह्मण संतुष्ट होते हैं और मैं उस प्रणाम करनेवाले मनुष्यके पापोंका नाश कर देता हूँ॥

यत्र कृष्टां वराहस्य मृत्तिकां शिरसा वहन् ।
प्राणायामशतं कृत्वा नरः पापैः प्रमुच्यते ॥
जहाँ वराहद्वारा उखाड़ी हुई मृत्तिका हो, उसको सिरपर धारण करके मनुष्य सौ प्राणायाम करता है तो वह पापोंसे छूट जाता है॥

दक्षिणावर्तशङ्खाद् वा कपिलाशृङ्गतोऽपि वा ।
प्राक्स्रोतसं नदीं गत्वा ममायतनसंनिधौ ॥
सलिलेन तु यः स्नायात् सकृदेव रविग्रहे ।
तस्य यत् संचितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥
जो मनुष्य सूर्यग्रहणके समय पूर्ववाहिनी नदीके तटपर जाकर मेरे मन्दिरके निकट दक्षिणावर्त शंखके जलसे अथवा कपिला गायके सींगका स्पर्श कराये हुए जलसे एक बार भी स्नान कर लेता है, उसके समस्त संचित पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं॥

पिबेत् तु पञ्चगव्यं यः पौर्णमास्यामुपोष्य तु ।
तस्य नश्यति तत् पापं यत् पापं पूर्वसंचितम् ॥
जो पूर्णिमाको उपवास करके पञ्चगव्यका पान करता है, उसके भी पूर्वसंचित पाप नष्ट हो जाते हैं॥

तथैव ब्रह्मकूर्चं तु समन्त्रं तु पृथक् पृथक् ।
मासि मासि पिबेद् यस्तु तस्य पापं प्रणश्यति ॥
इसी प्रकार जो प्रतिमास अलग-अलग मन्त्र पढ़कर संग्रह किये हुए ब्रह्मकूर्चका पान करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं॥

पात्रं च ब्रह्मकूर्चं च शृणु तत्र च भारत ।
पलाशं पद्मपत्रं च ताम्रं वाथ हिरण्मयम् ।
सादयित्वा तु गृह्णीयात् तत् तु पात्रमुदाहृतम् ॥
भरतनन्दन! अब मैं ब्रह्मकूर्च और उसके पात्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। पलाश या कमलके पत्तेमें अथवा ताँबे या सोनेके बने हुए बर्तनमें ब्रह्मकूर्च रखकर पीना चाहिये। ये ही उसके उपयुक्त पात्र कहे गये हैं॥

गायत्र्या गृह्णते मूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम् ।
आप्यायस्वेति च क्षीरं दधि क्राव्णेति वै दधि ॥
तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम् ।
आपो हिष्ठेत्यृचा गृह्य यवचूर्णं यथाविधि ॥
ब्रह्मणे च यथा हुत्वा समिद्धे च हुताशने ।