महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2228, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंआलोड्य प्रणवेनैव निर्मथ्य प्रणवेन तु ।। (ब्रह्मकूर्चकी विधि इस प्रकार है—) गायत्री<sup>१</sup> मन्त्र पढ़कर गौका मूत्र, ‘गन्धद्वार०’<sup>२</sup> इत्यादि मन्त्रसे गौका गोबर, ‘आप्यायस्व०’<sup>३</sup> इस मन्त्रसे गायका दूध, ‘दधि क्राव्ण०’<sup>४</sup> इस मन्त्रसे दही, ‘तेजोऽसि शुक्रम०’<sup>५</sup> इस मन्त्रसे घी, ‘देवस्य त्वा०’<sup>६</sup> आदि मन्त्रके द्वारा कुशका जल तथा ‘आपो हिष्ठा मयो०’ इस ऋचाके द्वारा जौका आटा लेकर सबको एकमें मिला दे और प्रज्वलित अग्निमें ब्रह्माके उद्देश्यसे विधिपूर्वक हवन करके प्रणवका उच्चारण करते हुए उपर्युक्त वस्तुओंका आलोडन और मन्थन करे ।।
उद्धृत्य प्रणवेनैव पिबेत् तु प्रणवेन तु । महतापि स पापेन त्वचेवाहिर्विमुच्यते ।। फिर प्रणवका उच्चारण करके उसे पात्रमेंसे निकालकर हाथमें ले और प्रणवका पाठ करते हुए ही उसे पी जाय। इस प्रकार ब्रह्मकूर्चका पान करनेसे मनुष्य बड़े-से-बड़े पापसे भी उसी प्रकार छुटकारा पा जाता है, जैसे साँप अपनी केंचुलसे पृथक् हो जाता है ।।
भद्रं न इति यः पादं पठन् ऋक् संहितां तदा । अन्तर्जले वाभ्यादित्ये तस्य पापं प्रणश्यति ।। जो मनुष्य जलके भीतर बैठकर अथवा सूर्यके सामने दृष्टि रखकर ‘भद्रं नः०’<sup>७</sup> इस ऋचाके एक चरणका या ऋक्संहिताका पाठ करता है, उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं ।।
मम सूक्तं जपेद् यस्तु नित्यं मद्गतमानसः । न पापेन स लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा ।। जो मुझमें चित्त लगाकर प्रतिदिन मेरे सूक्त (पुरुषसूक्त)-का पाठ करता है, वह जलसे निर्लिप्त रहनेवाले कमलके पत्तेकी तरह कभी भी पापसे लिप्त नहीं होता ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
१. तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।
२. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ।।
३. आप्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोमवृष्ण्यम् । भवाव्वाजस्य सङ्गथे ।। (यजु० अ० १२ मं० ११२)
४. दधि क्राव्णोऽकारिषञ्जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखाकरत्प्रणऽआयूँषि तारिषत् ।। (यजु० अ० २३।३२)
५. ॐ तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि । धामनामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि ।। (यजु० १।३१)
६. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् आददे। (यजु० अ० ३८।१)
७. भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमृत क्रतुम् । अध ते सख्ये अन्धसो विवो मदे रणान्गावो न यवसे विवक्षसे ।। (ऋ० मं० १० अ० २ सू० २६ मन्त्र १)