महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2229, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[उत्तम और अधम ब्राह्मणोंके लक्षण, भक्त, गौ और पीपलकी महिमा]
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशा ब्राह्मणाः पुण्या भावशुद्धाः सुरेश्वर ।
यत्कर्म सफलं नेति कथयस्व ममानघ ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**निष्पाप देवेश्वर! जिनके भाव शुद्ध हों, वे पुण्यात्मा ब्राह्मण कैसे होते हैं तथा ब्राह्मणको अपने कर्ममें सफलता न मिलनेका क्या कारण है? यह बतानेकी कृपा कीजिये ।।
श्रीभगवानुवाच
शृणु पाण्डव तत् सर्वं ब्राह्मणानां यथाक्रमम् ।
सफलं निष्फलं चैव तेषां कर्म ब्रवीमि ते ।।
**श्रीभगवान्ने कहा—**पाण्डुनन्दन! ब्राह्मणोंका कर्म क्यों सफल होता है और क्यों निष्फल—इन बातोंको मैं क्रमशः बताता हूँ, सुनो ।।
त्रिदण्डधारणं मौनं जटाधारणमुण्डनम् ।
वल्कलाजिनसंवासो ब्रह्मचर्याभिषेचनम् ।।
अग्निहोत्रं गृहे वासः स्वाध्यायं दारसत्क्रिया ।
सर्वाण्येतानि वै मिथ्या यदि भावो न निर्मलः ।।
यदि हृदयका भाव शुद्ध न हो तो त्रिदण्ड धारण करना, मौन रहना, जटा रखना, माथा मुँड़ाना, वल्कल या मृगचर्म पहनना, व्रत और अभिषेक करना, अग्निमें आहुति देना, गृहस्थ-धर्मका पालन करना, स्वाध्यायमें संलग्न रहना और अपनी स्त्रीका सत्कार करना—ये सारे कर्म व्यर्थ हो जाते हैं ।।
क्षान्तं दान्तं जितक्रोधं जितात्मानं जितेन्द्रियम् ।
तमग्रयं ब्राह्मणं मन्ये शेषाः शूद्रा इति स्मृताः ।।
जो क्षमाशील, दमका पालन करनेवाला, क्रोधरहित तथा मन और इन्द्रियोंको जीतनेवाला हो, उसीको मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण मानता हूँ। उसके अतिरिक्त जो ब्राह्मण कहलानेवाले लोग हैं, वे सब शूद्र माने गये हैं ।।
अग्निहोत्रव्रतपरान् स्वाध्यायनिरतान् शुचीन् ।
उपवासरतान् दान्तांस्तान् देवा ब्राह्मणा विदुः ।।
न जात्या पूजितो राजन् गुणाः कल्याणकारणाः ।
जो अग्निहोत्र, व्रत और स्वाध्यायमें लगे रहनेवाले, पवित्र, उपवास करनेवाले और जितेन्द्रिय हैं, उन्हीं पुरुषोंको देवता लोग ब्राह्मण मानते हैं। राजन्! केवल जातिसे किसीकी पूजा नहीं होती, उत्तम गुण ही कल्याण करनेवाले होते हैं ।।
मनश्शौचं कर्मशौचं कुलशौचं च भारत ।