भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2230, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2230

शरीरशौचं वाक्छौचं शौचं पञ्चविधं स्मृतम् ।।
मनःशुद्धि, क्रियाशुद्धि, कुलशुद्धि, शरीरशुद्धि और वाक्-शुद्धि—इस तरह पाँच प्रकारकी शुद्धि बतायी गयी है ।।
पञ्चस्वेतेषु शौचेषु हृदि शौचं विशिष्यते ।
हृदयस्य च शौचेन स्वर्गं गच्छन्ति मानवाः ।।
इन पाँचों शुद्धियोंमें हृदयकी शुद्धि सबसे बढ़कर है। हृदयकी ही शुद्धिसे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।।
अग्निहोत्रपरिभ्रष्टः प्रसक्तः क्रयविक्रयैः ।
वर्णसंकरकर्ता च ब्राह्मणो वृषलैः समः ।।
जो ब्राह्मण अग्निहोत्रका त्याग करके खरीद-बिक्रीमें लग गया है, वह वर्णसंकरताका प्रचार करनेवाला और शूद्रके समान माना गया है ।।
यस्य वेदश्रुतिर्नष्टा कर्षकश्चापि यो द्विजः ।
विकर्मसेवी कौन्तेय स वै वृषल उच्यते ।।
कुन्तीनन्दन! जिसने वैदिक श्रुतियोंको भुला दिया है तथा जो खेतमें हल जोतता है, अपने वर्णके विरुद्ध काम करनेवाला वह ब्राह्मण वृषल माना गया है ।।
वृषो हि धर्मो विज्ञेयस्तस्य यः कुरुते लयम् ।
वृषलं तं विदुर्देवा निकृष्टं श्वपचादपि ।।
वृष शब्दका अर्थ है धर्म; उसका जो लय करता है, उसको देवतालोग वृषल मानते हैं। वह चाण्डालसे भी नीच होता है ।।
स्तुतिभिर्ब्रह्मगीताभिर्यः शूद्रं स्तौति मानवः ।
न तु मां स्तौति पापात्मा स तु चण्डालतः समः ।।
जो पापात्मा मनुष्य ब्रह्मगीता आदिके द्वारा मेरी स्तुति न करके किसी शूद्रका स्तवन करता है, वह चाण्डालके समान है ।।
श्वदृतौ तु यथा क्षीरं ब्रह्म वै वृषले तथा ।
दुष्टामेति तत् सर्वं शुना लीढं हविर्यथा ।।
जैसे कुत्तेकी खालमें रखा हुआ दूध और कुत्तेका चाटा हुआ हविष्य अशुद्ध होता है, उसी प्रकार वृषल मनुष्यकी बुद्धिमें स्थित वेद भी दूषित हो जाता है ।।
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः ।
धर्मशास्त्रं पुराणं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश ।।
चार वेद, छः अंग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र और पुराण—ये चौदह विद्याएँ हैं ।।
यान्युक्तानि मया सम्यग् विद्यास्थानानि भारत ।
उत्पन्नानि पवित्राणि भुवनार्थं तथैव च ।।
तस्मात् तानि न शूद्रस्य स्पृष्टव्यानि युधिष्ठिर ।