भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2231, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2231

सर्वं च शूद्रसंस्पृष्टमपवित्रं न संशयः ॥ भरतनन्दन! मैंने जो विद्याके चौदह पवित्र स्थान पूर्णतया बताये हैं, वे तीनों लोकोंके कल्याणके लिये प्रकट हुए हैं। अतः शूद्रको इनका स्पर्श नहीं करना चाहिये। युधिष्ठिर! शूद्रके सम्पर्कमें आनेवाली सभी वस्तुएँ अपवित्र हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं है॥ लोके त्रीण्यपवित्राणि पञ्चामेध्यानि भारत । श्वा च शूद्रःश्वपाकश्च अपवित्राणि पाण्डव ॥ भारत! इस संसारमें तीन अपवित्र और पाँच अमेध्य हैं। पाण्डुनन्दन! कुत्ता, शूद्र और श्वपाक (चाण्डाल)—ये तीन अपवित्र होते हैं॥ गायकः कुक्कुटो यूपो ह्युदक्या वृषलीपतिः । पञ्चैते स्युरमेध्याश्च स्प्रष्टव्या न कदाचन । स्पृष्ट्वैतानष्ट वै विप्रः सचैलो जलमाविशेत् ॥ तथा अश्लील गायक, मुर्गा, जिसमें वध करनेके लिये पशुओंको बाँधा जाय वह खम्भा, रजस्वला स्त्री और वृषल जातिकी स्त्रीसे ब्याह करनेवाला द्विज—ये पाँच अमेध्य माने गये हैं; इनका कभी भी स्पर्श नहीं करना चाहिये। यदि ब्राह्मण इन आठोंमेंसे किसीका स्पर्श कर ले तो वस्त्रसहित जलमें प्रवेश करके स्नान करे॥ मद्भक्तान् शूद्रसामान्यादवमन्यन्ति ये नराः । नरकेष्वेव तिष्ठन्ति वर्षकोटिं नराधमाः ॥ जो मनुष्य मेरे भक्तोंका शूद्र-जातिमें जन्म होनेके कारण अपमान करते हैं, वे नराधम करोड़ों वर्षतक नरकोंमें निवास करते हैं॥ चण्डालमपि मद्भक्तं नावमन्येत बुद्धिमान् । अवमानात् पतन्त्येव नरके रौरवे नराः ॥ अतः चाण्डाल भी यदि मेरा भक्त हो तो बुद्धिमान् पुरुषको उसका अपमान नहीं करना चाहिये। अपमान करनेसे मनुष्यको रौरव नरकमें गिरना पड़ता है॥ मम भक्तस्य भक्तेषु प्रीतिरभ्यधिका मम । तस्मान्मद्भक्तभक्ताश्च पूजनीया विशेषतः ॥ जो मनुष्य मेरे भक्तोंके भक्त होते हैं, उनपर मेरा विशेष प्रेम होता है, इसलिये मेरे भक्तके भक्तोंका विशेष सत्कार करना चाहिये॥ कीटपक्षमृगाणां च मयि संन्यस्यचेतसाम् । ऊर्ध्वामेव गतिं विद्धि किं पुनर्ज्ञानिनां नृणाम् ॥ मुझमें चित्त लगानेपर कीड़े, पक्षी और पशु भी ऊर्ध्वगतिको ही प्राप्त होते हैं, फिर ज्ञानी मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ॥ पत्रं वाप्यथवा पुष्पं फलं वाप्यप एव वा । ददाति मम शूद्रो यच्छिरसा धारयामि तत् ॥