महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमेरा भक्त शूद्र भी यदि पत्र, पुष्प, फल अथवा जल ही अर्पण करे तो मैं उसे सिरपर धारण करता हूँ।। वेदोक्तेनैव मार्गेण सर्वभूतहृदि स्थितम्। मामर्चयन्ति ये विप्रा मत्सायोज्यं व्रजन्ति ते।। जो ब्राह्मण सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें विराजमान मुझ परमेश्वरका वेदोक्त रीतिसे पूजन करते हैं, वे मेरे सायुज्यको प्राप्त होते हैं।। मद्भक्तानां हितायैव प्रादुर्भावः कृतो मया। प्रादुर्भावकृता काचिदर्चनीया युधिष्ठिर।। युधिष्ठिर! मैं अपने भक्तोंका हित करनेके लिये ही अवतार धारण करता हूँ; अतः मेरे प्रत्येक अवतार-विग्रहका पूजन करना चाहिये।। आसामन्यतमां मूर्तिं यो मद्भक्त्या समर्चति। तेनैव परितुष्टोऽहं भविष्यामि न संशयः।। जो मनुष्य मेरे अवतार-विग्रहोंमेंसे किसी एककी भी भक्तिभावसे आराधना करता है, उसके ऊपर मैं निःसंदेह प्रसन्न होता हूँ।। मृदा च मणिरत्नैश्च ताम्रेण रजतेन च। कृत्वा प्रतिकृतिं कुर्यादर्चनां काञ्चनेन वा। पुण्यं दशगुणं विद्यादेतेषामुत्तरोत्तरम्।। मिट्टी, ताँबा, चाँदी, स्वर्ण अथवा मणि एवं रत्नोंकी मेरी प्रतिमा बनवाकर उसकी पूजा करनी चाहिये। इनमें उत्तरोत्तर मूर्तियोंकी पूजासे दसगुना अधिक पुण्य समझना चाहिये।। जयकामो भवेद् राजा विद्याकामो द्विजोत्तमः। वैश्यो वा धनकामस्तु शूद्रः सुखफलप्रियः। सर्वकामाः स्त्रियो वापि सर्वान् कामानवाप्नुयुः।। यदि ब्राह्मणको विद्याकी, क्षत्रियको युद्धमें विजयकी, वैश्यको धनकी, शूद्रको सुखरूप फलकी तथा स्त्रियोंको सब प्रकारकी कामना हो तो ये सब मेरी आराधनासे अपने सभी मनोरथोंको प्राप्त कर सकते हैं।।
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशानां तु शूद्राणां नानुगृह्णासि चार्चनम्। उद्वेगस्तव कस्माद्धि तन्मे ब्रूहि सुरेश्वर।। **युधिष्ठिरने पूछा—**देवेश्वर! आप किस तरहके शूद्रोंकी पूजा नहीं स्वीकार करते तथा आपको कौन-सा कार्य बुरा लगता है? यह मुझे बतलाइये।।
श्रीभगवानुवाच
अव्रतेनाप्यभक्तेन स्पृष्टां शूद्रेण चार्चनाम्।