महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2233, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतां वर्जयामि राजेन्द्र श्वपाकविहितामिव ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**राजन्! जो व्रतका पालन न करनेवाला और मेरा भक्त नहीं है, उस शूद्रकी स्पर्श की हुई पूजाको मैं कुत्ता पकानेवाले चाण्डालकी की हुई समझकर त्याग देता हूँ॥
नन्वहं शङ्करश्चापि गावो विप्रास्तथैव च ।
अश्वत्थोऽमररूपं हि त्रयमेतद् युधिष्ठिर ॥
एतत्त्रयं हि मद्भक्तो नावमन्येत कर्हिचित् ।
युधिष्ठिर! गौ, ब्राह्मण और पीपलका वृक्ष—ये तीनों देवरूप हैं। इन्हें मेरा और भगवान् शंकरका स्वरूप समझना चाहिये। मेरे भक्त पुरुषको उचित है कि वह इन तीनोंका कभी अपमान न करे॥
अश्वत्थो ब्राह्मणा गावो मन्मयास्तारयन्ति हि ।
तस्मादेतत् प्रयत्नेन त्रयं पूजय पाण्डव ॥
पाण्डुनन्दन! मेरे स्वरूप होनेके कारण पीपल, ब्राह्मण और गौ—ये तीनों मनुष्यका उद्धार करनेवाले हैं, इसलिये तुम यत्नपूर्वक इन तीनोंकी पूजा किया करो॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)